रामायण काल का पुष्पक विमान कैसा था! विशेषताएं जान रह जाएंगे हैरान

पुष्पक विमान कैसा था? इसकी क्या विशेषता थी और ये उड़ने में कैसा था? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर लोग जानने के लिए सदैव ही उत्सुक रहते है. कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि पुष्पक विमान का शास्त्रीय प्रमाण क्या है? हमारे कई शास्त्रों में इस विमान का जिक्र किया गया है. वाल्मिकी रामायण के उत्तर काण्ड में इस चमत्कारी विमान के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है, तो आइए जानते हैं पुष्पक विमान के बारे में-

स्वयं महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित ‘विमान शास्त्र’ नाम से एक पुस्तक हैं, जिसमे कई विमानों का उल्लेख हैं जैसे रूमा विमान, सुंदरा विमान, त्रिपुर विमान आदि का वर्णन मिलता हैं. वाल्मिकी रामायण और महाभारत में पुष्पक विमान का वर्णन हैं. चालिए पुष्पक विमान पर दृष्टि डालते हैं जिस पर सवार होकर भगवान श्रीराम लंका से अयोध्या आए थे.

वाल्णिकी रामायण युद्ध कांड 127.31-41 अनुसार, पुष्पक विमान की उत्पति भगवान विश्वकर्मा जी ने की थी. विश्वकर्मा के संकल्प से बनाया हुआ दिव्य पुष्पक विमान दूर से चंद्रमा की तरह दिखाई देता हैं. यह वाहन मन के वेग से चलता हैं. ब्रह्मा जी द्वारा कुबेर को दिए गए इस विमान विजयी श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के साथ साथ सुग्रीव और विभीषण अयोध्या लौटे थे.

वाल्मिकी रामायण उत्तर काण्ड 15.37-43 अनुसार, रावण ने यह विमान अपने भाई कुबेर से छीना था. उस विमान में सोने के खम्भे और वैदूर्यमणि के फाटक लगे थे. वह सब ओरसे मोतियों की जाली से ढका हुआ था. उसके भीतर ऐसे-ऐसे वृक्ष लगे थे, जो सभी ऋतुओं में फल देने वाले थे. उसका वेग मनके समान तीव्र था. वह अपने ऊपर बैठे हुए लोगों की इच्छा के अनुसार सब जगह ले जा सकता था, तथा चालक जैसा चाहे, वैसा छोटा या बड़ा रूप धारण कर लेता था.


इस आकाश–चारी विमान में मणि और सुवर्ण की सीढ़ियां तथा पाये और सोने की वेदियां बनी थीं. वह देवताओं का ही वाहन था और टूटने फूटने वाला नहीं था. सदा देखने में सुन्दर और चित्त को प्रसन्न करने वाला था. उसके भीतर अनेक प्रकार के आश्चर्यजनक चित्र थे. उसकी दीवारों पर तरह-तरह के बेल-बूटे बने थे, जिनसे उनकी विचित्र शोभा हो रही थी. ब्रह्मा (विश्वकर्मा) ने उसका निर्माण किया था. वह सब प्रकार की मनोवाञ्छित वस्तुओं से सम्पन्न, मनोहर और परम उत्तम था. न अधिक ठंडा था और न अधिक गरम. सभी ऋतुओं में आराम पहुंचाने वाला तथा मङ्गलकारी था.

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