सैनिटाइजर के भरोसे खुद को सेफ मान बैठे हों तो ये आपको बड़ी मुसीबत में ला सकता है

दुनिया में कोरोना से 1 करोड़, 17 लाख से बड़ी आबादी प्रभावित हो चुकी है. फिलहाल वैक्सीन की टेस्टिंग चल रही है. ऐसे में बचाव के लिए वैज्ञानिक सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क के साथ-साथ जिस एक बात पर काफी जोर दे रहे हैं, वो है हाथों को बार-बार साबुन से धोना. साबुन-पानी न होने पर हाथों को सैनिटाइजर से भी जर्म-फ्री किया जा सकता है.

हालांकि साथ में चेतावनी दी जा रही है कि इससे कई दूसरे खतरे भी हो सकते हैं, जैसे हार्मोनल बदलाव. यहां तक कि जिस वायरस को मारने के लिए सैनिटाइजर लगाया जा रहा है, वो वायरस को मारने के लिए भी काफी नहीं. इसके बाद भी बड़ा तबका सैनिटाइजर पर भरोसा किए बैठा है.

अब तक माना जा रहा था कि अल्कोहल-युक्त सैनिटाइजर से हाथों में पाए जाने वाले 99.99 जर्म्स खत्म हो जाते हैं. इनमें पाये जाने वाले तत्व जैसे एथेनॉल, आइसोप्रोपेनॉल या एन-प्रोपेनॉल बैक्टीरिया या वायरस की बाहरी सतह यानी प्रोटीन लेयर पर अटैक करते हैं. इससे जर्म्स खत्म हो जाते हैं. हालांकि हर सैनिटाइजर से यही काम हो सके, ऐसा जरूरी नहीं.

हाथों के वायरस पर काम करने के लिए सैनिटाइजर में 70 प्रतिशत या उससे ज्यादा अल्कोहल होना चाहिए. अमेरिकन केमिकल सोसायटी का मानना है कि हाथों का साफ होना या न होना इस बात पर भी निर्भर है कि हाथ कितने गंदे हैं. अगर हाथ बुरी तरह से गंदगी से सने होंगे तो सैनिटाइजर की सीमित मात्रा उस पर काम नहीं करेगी. अगर हाथों की गंदगी चिपचिपाहट वाली है, तब भी सैनिटाइजर असरदार नहीं रहते हैं. ऐसे में साबुन और पानी से हाथ धोना ही गंदगी खत्म करता है.

हैंड सैनिटाइजर को लेकर कई भ्रम पैदा हो चुके हैं. लेकिन एक्सपर्ट बार-बार चेता रहे हैं कि कोई भी सैनिटाइजर पूरी तरह से वायरस को खत्म नहीं कर पाता. ऐसे में साबुन पानी की जगह सैनिटाइजर के उपयोग के बाद खुद को सेफ मानते लोग कोरोना या किसी भी खतरनाक वायरस की चपेट में आ सकते हैं. सैनिटाइजर के बारे में कई मिथकों ने इसे और भी बढ़ावा दिया.

जबकि सच तो ये है कि अगर आपके हाथों में ऑयल लगा हुआ है और आप सैनिटाइजर लगाकर निश्चिंत होना चाहें तो ये भारी भूल साबित हो सकती है. असल में सैनिटाइजर से ग्रीसी गंदगी साफ नहीं होती, बल्कि वो हाथों में चिपककर और ज्यादा वायरस अट्रैक्ट करती है.

ऐसा ही एक मिथक ये है कि हाथों में भरपूर सैनिटाइजर लेकर अगर उसे अच्छी तरह से रगड़ा जाए तो वायरस खत्म हो जाते हैं. ये बात सही नहीं है. सैनिटाइजर चूंकि केमिकल-बेस्ड होते हैं इसलिए हाथों को उनसे स्क्रब करना एलर्जी दे सकता है.

सैनिटाइजर के कई बड़े खतरे भी हैं. जैसे अगर इसे ज्यादा वक्त के लिए इस्तेमाल किया जाए तो इससे शरीर में हार्मोनल असंतुलन भी हो सकता है. एफडीए का कहना है कि ट्राइक्लोजन युक्त सैनिटाइजर हार्मोनल गड़बड़ियां पैदा कर सकता है. जिससे एंटी बॉयोटिक रेजिसटेंस जैसी स्थिति पैदा हो सकती हैं. जानवरों पर किए गए अध्ययन बताते हैं कि अगर आप सैनिटाइजर्स का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं तो शरीर में हार्मोन अलग तरीके से व्यवहार करने लगते हैं. हालांकि इस पर अभी शोध चल रहा है कि इंसानों पर इसका क्या असर पड़ता है.

इसी तरह से अगर आपका सैनिटाइजर सुगंधित है तो इसका मतलब ये है कि इसमें कुछ टॉक्सिक केमिकल्स मिलाए गए हैं. कंपनियां अपने सीक्रेट सेंट फार्मूले को छिपाने के चलते ये नहीं बतातीं कि सैनिटाइजर में वास्तव में कौन सी सामग्री मिलाई गई है और वो दर्जनों केमिकल इसमें मिला देते हैं.

वैसे हैंड-हाइजीन की आदत बेहतर करने के बारे में बार-बार इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि गंदे हाथों का कोरोना से सीधा संबंध है. फ्लोरिडा में संक्रामक बीमारियों पर शोध कर रहे Dr. Dawn Mueni Becker कहते हैं कि अगर हाथ साबुन से धोए हुए नहीं हैं तो लगभग हर वक्त हाथ जर्म्स से भरे हुए होते हैं और मुंह, नाक, आंखों में पाए जाने वाले मेंब्रेन के जरिए अंदर पहुंच जाते हैं और सबसे पहले श्वसन तंत्र पर हमला करते हैं. ये रिपोर्ट The Atlanta Voice में प्रकाशित हुई थी. फेस टचिंग पर कई नए शोध भी आए हैं जो बताते हैं कि गंदी सतह को छूने के बाद अनजाने में चेहरा छूने की आदत के कारण न केवल कोरोना वायरस, बल्कि बैक्टीरिया-जन्य बीमारियों का खतरा भी रहता है.

सैनिटाइजर की बजाए साबुन से हाथ धोना कोरोना के खिलाफ सबसे कारगर हथियार बन गया है. साबुन के कण वायरस की बाहरी लेयर पर मौजूद लिपिड की लेयर को तोड़ते हैं, जिससे वायरस खत्म हो जाता है. वहीं साबुन सैनिटाइजर की अपेक्षा बहुत सेफ है. इससे ज्यादा से ज्यादा त्वचा में रूखापन आ सकता है, जिसे नमीयुक्त क्रीम या तेल लगाकर ठीक कर सकते हैं.

साभार-न्यूज 18