मध्य प्रदेश: आखिर क्यों गई कांग्रेस सरकार, कौन है जिम्मेदार, खुद कमलनाथ या कोई दूसरा-जानिए

आखिरकार वही हुआ, जिसकी आशंका शुरू से ही व्यक्त की जा रही थी. कांग्रेस की कमलनाथ सरकार जिस तेजी के साथ चली थी, उसी तेजी के साथ वापस चली गई. डेढ़ साल में सरकार के गिरने के लिए कौन जिम्मेदार है खुद कमलनाथ या फिर कोई और…सबसे बड़ा सवाल यही है? आखिर क्यों सरकार गिर गई…क्या कमलनाथ ने ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके लोगों को गंभीरता से नहीं लिया या फिर वह अपने खुद के ओहरे से बाहर नहीं निकल पाए.

लगातार सिंधिया की उपेक्षा और अनुभवहीन नेताओं पर भरोसा उन्हें ले डूबा. आइए जानते हैं कि आखिर ऐसी कौन सी वजहें थीं, जिसके कारण कमलनाथ सरकार धराशाही हो गई.

ओवरकॉन्फिडेंस भारी पड़ा
सरकार जिस दिन बनी थी, उसी दिन से कमलनाथ सरकार का ओवरकॉन्फिडेंस दिखाई देेने लगा था. दस दिन में किसानों की कर्जमाफी और युवाओं को चार हजार रुपए देने की घोषणा भी भारी पड़ गई. उसके बाद सरकार की कमियों पर फीडबैक आना शुरू हुआ तो उसे मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर कोई सुनने को तैयार नहीं था. मुख्यमंत्री के करीब रहने वाले अफसरों ने जमीनी विरोध का अहसास कभी मुख्यमंत्री को होने भी नहीं दिया.

अगर यह कहें कि मुख्यमंत्री ने भी खुद कभी इस पर गंभीरता नहीं दिखाई कि आखिर सरकार के कामकाज को पब्लिक में किस तरह से देखा जा रहा है. उनके विधायकों और मंत्रियों के काम को कैसे देखा जा रहा है. फीडबैक सिस्टम पूरी तरह से फेल साबित रहा. मुख्यमंत्री के करीबी अफसरों से लेकर नेताओं ने सच बोलने से परहेज किया और उसका नुकसान सरकार को उठाना पड़ा.

सिंधिया को किनारे करना
मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों के समय ज्योतिरादित्य सिंधिया को पोस्टर बॉय के तौर पर लांच किया गया था. मानकर चला जा रहा था कि अगर कांग्रेस की सरकार बनी तो सिंधिया मुख्यमंत्री हो सकते हैं. हालांकि मुकाबले में कमलनाथ भी शीर्ष पर ही थे. जब मुख्यमंत्री चुनने का नंबर आया तो कमलनाथ ने सिंधिया को राजनीतिक रूप से नेपथ्य में धकेल दिया.

उसके बाद लगातार सिंधिया को पीछे धकेलने का प्रयास किया गया। मुख्यमंत्री नहीं बन पाने के बाद सिंधिया ने प्रदेश अध्यक्ष के लिए दावेदारी की तो कमलनाथ और उनके समर्थकों ने वहां पर भी विरोध किया.

प्रदेश अध्यक्ष नहीं बन पाए और उसके बाद सिंधिया लोकसभा चुनाव भी हार गए. हार का ठीकरा उन्होंने सरकार की नाकामियों पर फोड़ दिया और उसके बाद सरकार को लेकर जनता की बात लेकर सामने आने लगे. उसका असर यह हुआ कि सिंधिया की बात को सुनने के बजाय सरकार और खुद कमलनाथ ने उन्हें चुनौती देना शुरू कर दिया.

सिंधिया ने कहा कि सरकार की कमियों को लेकर वह सड़क पर आएंगे.तो उम्मीद की जा रही थी कि कमलनाथ सिंधिया से बात करेंगे, लेकिन ऐसा न होकर उन्होंने चुनौती दे दी कि आइए…मैदान में. उसके बाद सिंधिया मैदान में आ गए और सरकार चली गई.

भाजपा पर एक साथ हमलावर होना
चुनाव हारने के बाद भाजपा अचानक से गुटों में बंट गई थी सरकार को अस्थिर करने की तो दूर की बात सरकार के खिलाफ हमलावर भी नहीं हो रही थी. ऐसे में सरकार आराम से चल रही थी, लेकिन अचानक कमलनाथ ने सलाहकारों के कहने पर पूरे प्रदेश में भाजपा नेताओं पर निशाना कसना शुरू कर दिया.

एक साथ हुए राजनीतिक और आर्थिक हमलों ने सभी भाजपा नेताओं को एक मोर्चे पर ला दिया और सरकार के खिलाफ तैयारी शुरू हो गई. सरकार ई—टेंडर और हनीट्रैप से भाजपा को डराने का सपना देखने लगी. मुख्यमंत्री भरोसे में रहे कि ई—टेंडर और हनीट्रैप में भाजपा नेताओं को घेरने के लिए पर्याप्त सामान है, लेकिन जब जरूरत पड़ी तो उनके पास कुछ भी नहीं निकला. ऐसे में सरकार भाजपा नेताओं को घेरने में भी कमजोर रही.

उधार के नेताओं के सहारे लड़ाई
कमलनाथ ने मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद अपने पास कोई भरोसेमंद नेता नहीं रखा. कमलनाथ के पास टीम छिंदवाड़ा तो थी, लेकिन उनके पास भरोसेमंद मददगार नेताओं की टीम खड़ी नहीं हो पाई. अनुभव रखने वाले विधायकों को मंत्रिमंडल से बाहर रखा गया और इसमें नए युवा विधायकों को कैबिनेट मंत्री बना दिया गया. पहली बार मंत्री बनने वाले कई नेता सीधे कैबिनेट मंत्री बने, ऐसे में उन्हें अनुभवहीनता का सामना करना पड़ा और आधी से ज्यादा कैबिनेट आम आदमी के संपर्क से बाहर हो गई.

जब सरकार मुश्किल में आई तो रणनीतिकार के तौर पर यही अनुभवहीन नेता सामने आए, जिसके कारण हालत सुधरने के बजाय बिगड़ते चले गए. कमलनाथ आखिर तक यह भरोसा नहीं कर पाए थे कि जमीन उनके पैरों के नीचे से खिसक गई है, क्योंकि उन्हें आखिर तक यही कहा जाता रहा कि अगर भाजपा पांच विधायक तोड़ेगी तो हम दस तोड़ देंगे. कमलनाथ इस पर भरोसा कर कांग्रेस के विधायकों को दरकिनार करते रहे.जिन मंत्रियों से विधायक सबसे ज्यादा नाराज थे, उन्हीं मंत्रियों के सहारे विधायकों को मनाने की कोशिश की जा रही थी. यही वजह रही कि कांग्रेस के विधायक मानने के बजाय और नाराज हो गए.