ये वह वो जीव, जिसके 1 लीटर खून की कीमत है 11 लाख रुपए

गहरे खारे पानी में रहने वाले जीव हॉर्स शू केकड़ा का खून मेडिकल फील्ड के लिए वरदान माना जाता है. इस केकड़े के खून की मदद से ये जांचने में आसानी होती है कि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल उपकरण पूरी तरह से बैक्टीरिया-फ्री हैं या नहीं.

समुद्र की रेतीली खोहों में रहने वाला ये केकड़ा दुनिया के कुछ सबसे पुराने जीवों में से है. माना जाता है कि ये धरती पर डायनासोर से भी पहले से हैं. 2019 में हुए एक मॉलिक्युलर एनालिसिस में पाया गया कि ये केकड़े इस ग्रह पर 45 करोड़ सालों से भी ज्यादा समय से हैं. यही वजह है कि इन्हें लिविंग फॉसिल्स की श्रेणी में रखा गया. यानी वे जीव, जिनके भीतर ऐसी खूबियां हैं जो सिर्फ फॉसिल (जीवाश्म) हो चुके जंतुओं के रिकॉर्ड में मिलती हैं.

विपरीत हालातों के बावजूद करोड़ों साल से सर्वाइव कर रहे हॉर्स शू में कई खासियतें हैं जैसे इसका खून नीले रंग का होता है. हमारे या लगभग सभी स्तनधारियों के खून का रंग लाल हैं क्योंकि इसमें आयरन वाला हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन को यहां से वहां लाता-ले जाता है. वहीं इस अनोखे जीव में आयरन की बजाए कॉपर यानी तांबे के साथ hemocyanin नामक केमिकल होता है जो हीमोग्लोबिन की तरह काम करता है. इसी की उपस्थिति के कारण केकड़े का खून नीला होता है. लेकिन खून के नीले होने के कारण ये कीमती नहीं, बल्कि इसकी वजह है खून में मौजूद रोग प्रतिरोधक कोशिकाएं.

इनके खून में अमीबोसाइट्स (amebocytes) कोशिकाएं पाई जाती हैं. ये कोशिकाएं जब बीमारी फैलाने वाले किसी भी पैथोजन के संपर्क में आती हैं तो इनसे एक केमिकल निकलता है जो उस जगह के खून को जमा देता है. इस प्रक्रिया में बैक्टीरिया जमे हुए खून के भीतर कैद होकर तुरंत नष्ट हो जाते हैं और केकड़ा सुरक्षित बच निकलता है. खून को जमाकर बैक्टीरिया या वायरस को मारने की इनकी यही खूबी हमारे काम आ रही है.

सबसे पहले रिसर्च के दौरान जब खून में से ये तत्व निकाला गया तो उसे Limulus Amebocyte Lysate कहा गया, अब इसे ही छोटा करके LAL कहा जाने लगा है. वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया कि इसके खून में मौजूद तत्व के इस्तेमाल से मेडिकल उपकरणों को पूरी तरह से जर्म-फ्री किया जा सकता है. इस बात के साबित होते ही इस समुद्री जीव का खून सोने से भी कहीं ज्यादा कीमती हो गया. साल 1970 से मेडिकल एक्सपर्ट इस जीव के खून का इस्तेमाल ये जांचने में कर रहे हैं कि मेडिकल उपकरण और दवाएं पूरी तरह से बैक्टीरिया-मुक्त हैं या नहीं. इन उपकरणों में न केवल सिरिंज बल्कि इंट्रावेनस, सर्जरी और टीके के दौरान इस्तेमाल होने वाली चीजें भी शामिल हैं.

बता दें कि दूषित मेडिकल उपकरणों से इस्तेमाल से मरीज की जान जाने का खतरा रहता है. ऐसे में माना जा रहा है कि सिर्फ इस केकड़े के खून के कारण अबतक करोड़ों जिंदगियां सुरक्षित रह सकी हैं. हालांकि इंसानी जानें बचाने का खामियाजा इस इनवर्टिब्रेट को भुगतना पड़ा है. Big Think की एक रिपोर्ट के अनुसार फार्मा कंपनियां हर साल 6 लाख से भी ज्यादा केकड़े लैब में ही तैयार करती हैं और उन्हें समुद्र में छोड़ने से पहले उनके शरीर से 30% खून निकाल लेती हैं. खून निकाले जाने की प्रक्रिया में बहुत से केकड़े मर भी जाते हैं. लैब से समुद्र तक लाने और छोड़े जाने के दौरान भी ये मरते हैं. Scientific American की मानें तो मेडिकल इस्तेमाल की वजह से इनकी मृत्युदर 30 प्रतिशत से भी ज्यादा है. समुद्र में वापस लौटी मादा हॉर्स शू प्रजनन में कई तरह की मुश्किलों का सामना करती है.

अब पशु प्रेमी और समुद्री जीवों के लिए काम करने वाले लोग मांग कर रहे हैं कि केकड़े के इस्तेमाल को बंद किया जाए और इसकी बजाए बैक्टीरिया की जांच के लिए कोई सिंथेटिक प्रक्रिया खोजी जाए. International Union for the Conservation of Nature ने साल 2016 में इसे खत्म हो रहे जंतुओं की श्रेणी में रखा. हालांकि फार्मा कंपनियों का मानना है कि सिंथेटिक प्रक्रिया उतनी प्रामाणिक नहीं हो सकती है, जितना कि इस केकड़े का खून. चूंकि इन्हें लैब में पालने से रोकने या फिर प्रक्रिया के तहत खून निकालने से रोकने के लिए कोई ठोस कानून नहीं बन सका है इसलिए अब भी धड़ल्ले से इन्हें नुकसान पहुंचाया जा रहा है.

साभार-न्यूज 18