“फूलदेई” उत्तराखंडी परम्परा और प्रकृति से जुड़ा सामाजिक त्यौहार

उत्तराखंड राज्य न केवल प्राकृतिक परिदृश्य और प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध है बल्कि इस प्रदेश की अपनी एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भी है. यहॉ की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराएं मुख्य रूप से धर्म और प्रकृति में निहित हैं. यहॉ के हर त्योहर में प्रकृति का महत्व झलकता है. इसी क्रम मे एक त्योहार है- फूलदेई.

फूलदेई भारत के उत्तराखण्ड राज्य का एक स्थानीय त्यौहार है, जो चैत्र माह के आगमन पर मनाया जाता है. सम्पूर्ण उत्तराखंड में इस चैत्र महीने के प्रारम्भ होते ही अनेक पुष्प खिल जाते हैं, जिनमें फ्यूंली, लाई, ग्वीर्याल, किनगोड़, हिसर, बुराँस आदि प्रमुख हैं . चैत्र की पहली गते से छोटे-छोटे बच्चे हाथों में कैंणी (बारीक बांस की बनी टोकरी) लेकर प्रातः काल 4-5 बजे के लगभग अपने खेतों में या आँगन में जाकर फूलों को एकत्र करते हैं . अनन्तर सर्वप्रथम गाँव के मंदिर की देहली पर फूल श्रध्दा के साथ चढ़ाए जाते हैं . तत्पश्चात अपने घरों की सभी देहलियों पर इन पुष्पों को चढ़ाया जाता है . ये बच्चे 8-9 दिनों तक इसी प्रकार पुष्प एकत्र करके चढ़ाते हैं .

इसे गढ्वाल मे घोघा कहा जाता है. पहाड के लोगों का जीवन प्रकृति पर बहुत निर्भर होता है, इसलिये इनके त्यौहार किसी न किसी रुप में प्रकृति से जुड़े होते हैं. प्रकृति ने जो उपहार उन्हें दिया है, उसे वरदान के रूप मे स्वीकर करते है और उसके प्रति आभार वे अपने लोक त्यौहारों के माध्यम से प्रकट करते है.

फूलदेई त्योहार का संबंध भी प्रकृति के साथ जुडा है. यह बसंत ऋतु के स्वागत का प्रतीक है, बसंत ऋतु में चारो और रंग बिरंगे फूल खिल जाते है, बसन्त के आगमन से पूरा पहाड़ बुरांस और की लालिमा और गांव आडू, खुबानी के गुलाबी-सफेद रंगो से भर जाता है. फिर चैत्र महीने के पहले दिन इतने सुंदर उपहार देंने के लिये गांव के सारे बच्चों के माध्यम से प्रकृति मां का धन्यवाद अदा किया जाता है. इस दिन छोटे बच्चे खासकर लड़कियां सुबह ही उठकर जंगलों की ओर चले जाते हैं और वहां से प्योली/फ्यूंली, बुरांस, बासिंग आदि जंगली फूलो के अलावा आडू, खुबानी, पुलम के फूलों को चुनकर लाते हैं. फिर बच्चे और महिलाये मिलकर घोघा देवता की डोली सजाते है. एक थाली या रिंगाल की टोकरी में चावल, हरे पत्ते, और खेतों और जंगल से तोड़ कर लाये ताजे फूलों को सजाकर घोघा देवता की पूजा करते है और यह गीत गाते हुए बच्चे बारी-बारी से घोघा देवता की डोली को कंधे पर उठाकर नचाते हुए यह गीत गाते है :

फूल देई, छम्मा देई,

देणी द्वार, भर भकार,

ये देली स बारम्बार नमस्कार,

फूले द्वार……फूल देई-छ्म्मा देई.

घोघा माता फ्युला फूल

दे दे माई दाल चौल

घोघ देवता की डोली और फूलों की थाली और डलिया लेकर बच्चो की टोली पूरे ग़ाव मे घर-घर पर जाती है” और हर घर की देहरी पर फूल डालते है, वे घर की समृद्धि के लिए अपनी शुभकामनाएं देते हैं. ये फूल अच्छे भाग्य के संकेत माने जाते हैं. महिलाए घर आये बच्चों का स्वागत करती है , उन्हे उप हार मे ,चावल, गुड़, और कुछ पैसे और आशीर्वाद देते है. इस तरह से यह त्योहार आठ दिन तक चलता है. आठ्वें दिन सारे बच्चे किसी एक घर या किसी सामुहिक स्थान पर उपहार मे मिले गुड़ चावल दाल आदि से हलवा और अन्य पारम्परिक व्यंजन बनाते है. इसमे बडे लोग भी उनकी मदद करते है. इस प्रसाद से सबसे पहले देवता को चढाया जाता है बाद में सभी को बॉटा जाता है. बच्चे बडे स्वाद से ये पकवान खाते हैं और सब गॉव वालों को खिलाते है. इस प्रकार प्रकृति –पूजा का यह फ़ूलदेई त्योहार चैत्र मास के आठ्वें दिन सम्पन्न हो जाता है.