सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने के बाद क्या कमलनाथ बचा पाएंगे अब अपनी सरकार- जानें पूरा सियासी गणित

प्रदेश में सियासी भूचाल आया हुआ है. ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने के बाद सीएम कमलनाथ की मुश्किलें बढ़ गई हैं. 22 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कमलनाथ अब अपनी सरकार बचा पाएंगे? या फिर एक बार फिर से राज्य में बीजेपी की वापसी होगी. आइए आकंड़ों के खेल और संविधान के नियमों के जरिए इसे समझने की कोशिश करते हैं.

मौजूदा राजनीतिक हालात में विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति की भूमिका बेहद अहम हो गई है. अध्यक्ष को सभी 22 विधायकों के इस्तीफे मिल गए हैं. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक अध्यक्ष को 7 दिन में फैसला लेना होगा. एनपी प्रजापति का कहना है कि वो सभी विधायकों से मिलने बाद ही कोई फैसला करेंगे. दरअसल ये पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि क्या इन सभी ने किसी दबाव में इस्तीफा दिया है या फिर खुद अपने मन से.

अब तक कांग्रेस के 114 में से 22 विधायकों ने इस्तीफे दिए हैं. अगर विधानसभा अध्‍यक्ष ने इन्हें स्‍वीकार कर लिया तो विधानसभा में सदस्‍यों की संख्‍या 206 पहुंच जाएगी. जबकि कांग्रेस के विधायकों की संख्या घटकर 92 पर पहुंच जाएगी. बीजेपी विधायकों की संख्या 107 है. इसके अलावा 4 निर्दलीय, 2 बसपा और 1 सपा विधायक हैं, जो कांग्रेस को समर्थन कर रहे हैं. अगर ये सब कांग्रेस का समर्थन करते हैं तो भी ये संख्या 99 तक ही पहुंचेगी.

क्या कहता है नियम?
संविधान के नियमों के मुताबिक विधानसभा अध्‍यक्ष इस्‍तीफा देने वाले सभी 22 सदस्‍यों को पूरे कार्यकाल के लिए अयोग्‍य घोषित नहीं कर सकते हैं. आपको याद होगा कि पिछले साल कर्नाटक में विधानसभा अध्‍यक्ष ने इस्‍तीफा देने वाले बागी विधायकों को हमेशा के लिए अयोग्‍य घोषित कर दिया था. बाद में ये पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था. कोर्ट ने इन सारे विधायकों को उपचुनाव लड़ने की छूट दी थी.

राज्यपाल की भूमिका
उधर मध्य प्रदेश के मौजूदा राज्यपाल लालजी टंडन की भी पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर है. 16 मार्च से बजट सत्र शुरू हो रहा है. इसी सत्र में इस सरकार का भविष्‍य तय हो सकता है. अगर सरकार बजट पारित कराने में नाकाम रही तो फिर सरकार का गिरना तय है. विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 230 है. संविधान के जानकारों की माने तो अगर आधे से ज्यादा सदस्य इस्तीफा दे देते हैं उसके बाद ही राज्यपाल कोई फैसला ले सकते हैं. हालांकि ये राज्यपाल के विवेक पर निर्भर करेगा कि वो सदन को भंग कर मध्यावधि चुनाव की सिफारिश करे या सिर्फ खाली सीटों पर उपचुनाव कराएं.

साभार -न्यूज़ 18