चैत्र नवरात्रि 2018 : जानिए प्रथम दिन कैसे करें कलश स्थापना और ‘शैलपुत्री’ की पूजा

चैत्र नवरात्रि को वासंतिक नवरात्रि के तौर पर भी जाना जाता है. चैत्र नवरात्रि शक्ति की उपासना के लिए बेहद खास है. इस बार चैत्र नवरात्रि का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानि 18 मार्च (रविवार) से हो रहा है.

इस चैत्र नवरात्रि का समापन चैत्र शुक्ल नवमी यानि 25 मार्च (रविवार) के होगा. इस बार चैत्र नवरात्रि 8 दिन की होगी. क्योंकि इस बार सप्तमी और अष्टमी तिथि एक साथ है.

नवरात्रि के द‌िनों में मनुष्य अपनी भौत‌िक, आध्यात्म‌िक, यांत्र‌िक और तांत्र‌िक इच्छाओं को पूर्ण करने की कामना से व्रत और उपवास रखता है. ज्योतिष की दृष्टि से भी यह चैत्र नवरात्रि विशेष महत्व का है. इस नवरात्रि के दौरान सूर्य का राशि परिवर्तन हो रहा है. सूर्य राशि परिवर्तन कर मीन राशि में प्रवेश कर रहा है.

कलश स्थापना का शुभ महूर्त

  • नवरात्रि में कलश स्थापना प्रतिपदा को की जाती है.
  • इस बार चैत्र नवरात्रि में कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त शाम 06 बजकर 32 मिनट तक रहेगा.
  • इसलिए शाम 06 बजकर 32 मिनट से पहले ही कलश स्थापना कर लेना चाहिए.
  • कलश स्थापना के लिए सिद्ध योग (सर्वाधिक शुभ समय) सुबह 09 बजे से 10:30 तक है.

ऐसे करें कलश स्थापना

  • नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को शुद्ध करना चाहिए.
  • छोटी चौकी अथवा लकड़ी का पटरा रखकर उसके ऊपर लाल कपड़े का आसन बिछाना चाहिए.
  • इसके बाद एक मिट्टी के पात्र में जौ बोना चाहिए.
  • अब इस पात्र पर पात्र पर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करना चाहिए.
  • कलश के मुख को ढक्कन से ढक देना चाहिए.
  • ढक्कन पर अरवा चावल (अक्षत) भरना चाहिए.
  • छिलके लगे नारियल से को कलश के ढक्कन पर रखना चाहिए.
  • फिर दीपक जलाकर कलश की पूजा करनी चाहिए.
  • यह ध्यान रखना चाहिए कि नवरात्रि के निमित्त कलश, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का ही हो.

ये है नवरात्रि का व्रत-विधान

  • नवरात्रि में पूरे नौ दिन भी व्रत रख सकते हैं और दो दिन भी कर सकते हैं.
  • जो लोग नौ दिन व्रत रखते हैं उन्हें दशमी के दिन पारण करना चाहिए.
  • व्रत के दौरान जल और फल का स्वान कर सकते हैं.
  • व्रत की अवधि में ज्यादा तले भुने हुए आहार ग्रहण नहीं करना चाहिए.

प्रथम दिन शैलपुत्री की पूजा ऐसे करें

  • नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की उपासना का विधान है.
  • माता शैलपुत्री को हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है.
  • पूर्व जन्म में इनका नाम सती था जो भगवान शिव की पत्नी थी.
  • सती के पिता प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव का अपमान कर दिया था.
  • जिस कारण सती ने खुद को आपको यज्ञ अग्नि में भस्म कर लिया.
  • अगले जन्म में यही सती शैलपुत्री बनी और भगवान शिव से इनका विवाह हुआ.
  • माता शैलपुत्री की पूजा से सूर्य-संबंधी समस्याएं दूर होती हैं.
  • माता शैलपुत्री को गाय के शुद्ध घी का भोग लगाना चाहिए.
  • ऐसा करने से अच्छा स्वास्थ्य और मान सम्मान मिलता है.

 

साभार -हरिभूमि