एक अनोखी यात्रा जिसका खर्च पहले से ही कोई और चुका जाता है!

हम सभी ने फूलों की घाटी (Vally of Flower) का नाम तो सुना ही होगा जोकि उत्तराखण्ड हेमकुण्ट साहिब जाते हुए हमे मिलती है. चारों तरफ रंग-बिरंगे फूलों से लदी हुई यह घाटी, स्वर्ग का एहसास कराती है. एहसास कराती है एक अलग जगह का, मन खुशियों से झूम उठता, यात्रा की थकान मानो छमूंतर हो गई, रास्ते में आई सारी बाधाएँ इस नजारे को देखकर विस्मृत हो गई. ऐसे ही कश्मीर की भी वादियों की फिजाएँ हमारे जहन को रोमांचित और पुलकित करती है. यात्रा तो कोई भी हो रोमांचकारी होती है. रोमांच इसलिए क्योंकि उसमें आनन्द भी है और कठिनाईयाँ भी है, बाधाएँ भी है .कहें तो कष्टों के बाद मिली हुईं खुशियाँ ‘खुशी और गम का संगम’ पैदा करता है असल रोमांच!

ऐसी ही एक अनोखी और रोमांच से भरपूर यात्रा है VALLEY OF THREE & HALF (3½). एक ऐसी यात्रा जिसका खर्च पहले से कोई और यात्री चुका जाता है.

मैं अपनी पत्नी के साथ जब इस यात्रा पर निकला तो सारी तैयारियाँ कर, मन को भी तैयार करके ही निकले थे. दस दिनों की यात्रा में 100 यात्री सहभागी थे, जो साथ-साथ चल रहे थे. यात्रा की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 10 दिनों में से साढ़े तीन दिन केवल ओरिएंटेसन और अभ्यास ही करवाया गया. यह पहला पड़ाव था. इन साढ़े तीन दिनों में शरीर और मन को बहुत ही गहराई से तैयार किया जाना जरूरी था. सभी यात्रियों को बहुत ही गंभीरता से, समझदारी, सजगता से सचेत होकर काम करना था, तभी आगे की यात्रा की ठीक-ठीक अनुभूति सभी को मिल सकती थी. कहने को तो सौ यात्रियों का जत्था एक साथ था, पर साथ होते हुए भी यात्रा नितान्त एकान्त होने वाली थी, अकेले अकेले ही चलना था. चल अकेला.आपस में कोई बातचीत नहीं, यहाँ तक की इशारों की भी मनाही हो गई थी।

साढ़े तीन दिन के पहले पड़ाव को पूरा करने के बाद सभी को एक विशेष दृष्टि रूपी चश्मा दिया गया जिसको लगाकर आगे की VALLEY OF THREE & HALF (3½) की यात्रा होनी थी. आपस में बातचीत तो दूर इशारे से भी बात नहीं कर सकते थे. इसलिए थोड़ा भी खटर-पटर हुआ नहीं कि VALLEY OF THREE & HALF (3½) की यात्रा को अनुभव नहीं कर सकते. ज्यादातर ने इस बात को समझ लिया था किन्तु एक-आध तो हर जगह होते ही हैं. जैसे ही उन्होंने बातचीत की चश्मे ने काम करना बन्द कर दिया जो अनुभव आ रहे थे बन्द हो गए. पड़ोसी से जानना चाहा कि क्या हो रहा है तो कोई क्यों बोले, क्योंकि जो बोलेगा – बेताल उड़ जाएगा. वही बेताल जिसने कहा था, ‘विक्रम तू मेरी बात बड़ी गहराई से सुन, समझ और अनुभव कर. कही-सुनाई बातों पर मत जा, अपने विवेक से काम ले. लेकिन तू जैसे ही कुछ बोलेगा, मैं उड़ जाउँगा।’ और वही होता है. जवाब में जैसे ही विक्रम बोलता है, बेताल उड़ जाता है. विक्रम विक्रम विक्रम, बेताल ताल-ताल—.इसलिए सभी चुपचाप साँस साधे हुए एकाग्रता से इस दिव्य-दृष्टि चश्मे के सहारे से VALLEY OF THREE & HALF (3½) के नजारों को देखने की कोशिश कर रहे थे—–, जिन्होंने प्रारम्भिक 3½ दिन गहराई से अभ्यास किया, सारे नियमों का पालन किया, उन्हें वो नजारे, अनुभूतियाँ मिल भी रही थी. लेकिन ये अनुभूतियाँ सभी की भिन्न-भिन्न थी.यहाँ तक कि एक ही व्यक्ति को अलग-अलग तरह के नजारे अलग-अलग समय में मिल रहे थे. पुलकन, स्पन्दन, दुखद, सुखद, हल्के, भारी, शीत लहर तो कभी अति उष्ण और जाने क्या, ऐसी अनुभूतियाँ जिनका नाम ना तो सुना, ना पढ़ा।

वैसे देखा जाए तो सारी यात्रा ही स्वयं के अनुभवों से चल रही थी. थोड़ा भी संभले नहीं, सजग नहीं रहे तो एक तरफ कुआँ दूसरी तरफ खाई. बहुत ही बारीक पगडंडी के सहारे सहारे चलना था और चलते हुए इस दृष्टि को भी स्पष्ट रखना था कि कुछ भी मनचाहा अनचाहा की कल्पना की तो जिस उद्देस्य के लिए यात्रा कर रहे हैं वो अधूरा रह जायेगा. जैसा घट रहा है या हो रहा है, उसे यथाभूत वैसा ही अनुभव करते हुए बढ़ते जाना था.सब कुछ पल-पल प्रति पल बदल जाता था.कई बार तो बहुत थकान, भारीपन भी महसूस होता था तो कई बार ऐसा लगा जैसे सब कुछ हल्का निश्चल सा हो गया.सब कुछ अनित्य लोक-सा लग रहा था. बड़ी तेजी से सब कुछ बदल रहा था. घट रहा था.ओह! बाहर से दिखने वाला स्थाई, अंदर से इस चश्मे की दृष्टि से देख रहे थे तो कुछ स्थाई नहीं था. शाश्वत तो यही था कि कुछ भी शाश्वत नहीं है. नित्य यही था कि सब कुछ अनित्य है.

धीरे-धीरे यात्रा नौवें दिन के पड़ाव पर आ गई है. अब लगता है, आप भी समझ ही रहे होंगे ये VALLEY OF THREE & HALF (3½)क्या है? यह है अपने साढ़े तीन हाथ की काया. इसी का अंतःदर्शन करने का सौभाग्य इसमें मिला. विपश्यना की दिव्य-दृष्टि वाले चश्मे से ही ये यात्रा आगे बढ़ रही थी. शरीर के भीतर होने वाली सभी प्रकार की सुखद दुखद रोमांचकारी घटनाएँ प्रत्यक्ष अनुभव पर उतर रही थी, जो किताबों में पढ़ा था चेतन मन – उप चेतन मन सब कुछ अनुभव हुआ. मन की चंचलता और उसकी स्थिरता की ताकत भी.ऊपर के जागृत मन से कितना ज्यादा प्रभावी है (और बड़ा दायरा या यूँ कहें असीमित दायरा). इसे तो केवल विपश्यना से ही जाना जा सकता है और जो शुरू के साढ़े तीन दिन का अभ्यास था, वह था आनापान यानि मन की एकाग्रता का अभ्यास. अपनी निरन्तर चल रही श्वास के सहारे-सहारे, मन को एकाग्र करना बिना किसी आलंबन के, शुद्ध शाश्वत, सहज, स्वाभाविक तरीके से.

आते जाते श्वास पर रहे निरन्तर ध्यान।
मन सुधरे मंगल सधे हो परम कल्याण।।

यात्रा के इस आखिरी पड़ाव में जब सभी को मंगलमैत्री, सद्भावना देने की अभ्यास कराया गया.तब आनन्द के चरमोत्कर्ष ने छू लिया.मन कितना हल्कापन महसूस कर रहा है, सभी चल अचल, जल थल नभ के जीवों के मंगल की कामना ने उनके भले होने की भावना ने कितना विराट बना दिया था।

अन्य यात्राओं से वापस आने पर कई दिन थकान हो जाती थी लेकिन 10 दिन की इस विपश्यना ने मन, बुद्धि, प्राण और शरीर में एक नये उत्साह का संचार कर दिया है.पता ही नहीं चला कब मन के दुर्गुण, विकार दूर होते चले गए.मन शांत और स्थिर होता हुआ बलवान होता चला गया.किसी ने ठीक ही कहा है.मन के जीते जीत, ये मन ही है जो सब करवाता है. हमारे राग, आसक्तियाँ, मनचाहा और द्वेष, अनचाहा के कारण ही हमारे विकार हमें व्याकुल करते हैंऔर हम छोटी-छोटी बातों से हमेशा आहत होकर अनमोल जीवन को खोते चले जाते हैं.

जीना चाहो तो जी लो वरना ये सिर की बला है, जीना भी लेकिन कला है||

यात्रा का खर्च: वैसे तो मुफ्त कह सकते हैं या हमारी यात्रा के लिए पहले ही किसी लाभान्वित यात्री ने पैसा चुका दिया. इसलिए कोई चार्ज, फीस नहीं है. लेकिन सोचने की बात है कि क्या मैं भी आने वाले यात्रियों के लिए कुछ कर सकता हूँ और आखिरी दिन ऐसा मन बन जाता है, “चलो हम तो कुछ देना सीखें” यही है अनासक्त भाव, वीतरागिता।

Rhond Byrne की ‘The Secret’ पुस्तक पढ़ी तो भी लाभ मिला, लेकिन वो केवल बुद्धि स्तर तक ही था. विपश्यना ने सोये मन के तारों को छेड़ा और उसके राज़ खोले. एक ऐसा अनुभव कराया जोकि बहुत गहरा एवं अद्भुत था. लगभग ढाई हजार साल पुराना भगवान बुद्ध का यह ज्ञान आज फिर से विश्व को शांति और सद्भाव की प्रेरणा देते हुए बढ़ता जा रहा है।

आकुल-व्याकुल मन वाले लाखों-लाख लोग इस विपश्यना की विधि से अपना ही नहीं अपने परिवार, आसपास के वातावरण को मंगलमैत्री की सद्भावना से प्रभावित कर रहे हैं.काम करने के तरीके, जीवन को देखने और जीने की दृष्टि ही बदल जाती है –

नजर बदली नजारे बदल गए।
किश्ती का रूख बदला किनारे बदल गए।।

शब्दों का अर्थ –
वक्रम = जाग्रत मन – चेतन मन – केवल जागते हुए काम करता है।
बेताल = सुप्त मन – अचेतन मन – 24 घण्टे काम करता है
कुआँ = राग, आसक्ति – मनचाहा, चाहिए, प्रिय
खाई = द्वेष – अनचाहा, नहीं चाहिए, अप्रिय
पगडंडी= चित्त की चेतना के सहारे

लेखक परिचय –

मुकेश त्रिपाठी, नई दिल्ली स्थित सूर्या रोशनी लिमिटेड में डेप्युटी मैनिजिंग डाइरेक्टर पद पर कार्यरत हैं और विपस्यना के साधक भी हैं.
यात्रा विवरण – मुम्बई विपश्यना केन्द्र-पैगोडा: 15-26 जनवरी, 2019