लालबहादुर शास्त्री पुण्यतिथि विशेष : आज भी अनसुलझे हैं उनकी मौत के राज

शुक्रवार को देश के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की 53वीं पुण्यतिथि है. लालबहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 में मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था. 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद में पाकिस्तान के साथ शांति समझौते पर करार के महज 12 घंटे बाद 11 जनवरी को तड़के उनकी अचानक हुई मौत पर सवाल आज भी अनसुलझे हैं.

उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे. वे भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री थे. जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहान्त हो जाने के बाद साफ सुथरी छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया.

उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधान मन्त्री का पद भार ग्रहण किया. वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे. इस प्रमुख पद पर उनका कार्यकाल अद्वितीय रहा. उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था. गोविंद बल्लभ पंत के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मन्त्रालय सौंपा गया. परिवहन मन्त्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी. पुलिस मन्त्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियन्त्रण में रखने के लिये लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारम्भ कराया. 1951 में, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये. उन्होंने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिये बहुत परिश्रम किया.

उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया. इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था. शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी. इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी. ताशकन्द में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी.

बात उन दिनों की है जब लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री थे व केरल में सूखा पड़ा हुआ था. चावल की खेती पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी. लोग चावल के दाने को तरसने लगे थे. चूंकि केरलवासियों का मुख्य भोजन चावल ही है इसलिए राज्य सरकार चिंतित थी कि केरल निवासी अपनी दिनचर्या कैसे करेंगे!

शास्त्री जी केरल की समस्या जानकर बहुत व्यथित हुए. उन्होंने केरल सरकार को आश्वासन दिया कि प्रदेश के लिए चावल का उचित प्रबंध किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि मेरा संकल्प है कि हर केरलवासी को चावल मिलेगा. बिना चावल के एक भी भाई-बहन भूखा नहीं रहेगा. केरल की जनता को चावल के लिए त्राहि-त्राहि करते देखकर उन्होंने अधिकारियों को चावल की कमी पूरी करने के आदेश दिए. देश के अन्य क्षेत्रों से चावल खरीदकर केरल भेजा जाने लगा.

ऐसे में अन्य प्रदेशों में चावल की कमी होनी स्वाभाविक थी. शास्त्री जी ने रोटी खा सकने वाले लोगों से अनुरोध किया कि वे चावल का प्रयोग कम से कम करें और जो लोग स्वाद के लिए प्रतिदिन चावल का प्रयोग करते हैं, वे भी इसका प्रयोग अनिवार्य होने पर ही करें. उन्होंने अपने घर में भी निर्देश दिए थे कि जब तक केरल में चावल की कमी पूरी नहीं हो जाती तब तक उनके घर में चावल नहीं पकाए जाएं. यह आदेश सुनकर शास्त्रीजी के बच्चे दुखी हुए क्योंकि चावल उन्हें भी प्रिय थे लेकिन शास्त्री जी के आदेश का पालन किया गया.

प्रधानमंत्री निवास में तब तक चावल नहीं पकाए गए जब तक कि केरल की स्थिति पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं पा लिया गया. केरल की सरकार व निवासियों के सहित संपूर्ण भारत ने शास्त्री जी की कार्यशैली के प्रति नतमस्तक हो गया कि शास्त्री जी ने केरल की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझकर प्रधानमंत्री निवास तक में चावल बनने पर रोक लगा दी.