भाई दूज : जानिए भाई दूज की कथा

दिवाली के दो दिन बाद भाई दूज का त्यौहार मनाया जाता है. यह त्यौहार रक्षा बंधन की तरह एक पावन पर्व है. इस साल 9 नवंबर को भाई दूज मनाया जाएगा. यह त्योहार भाई बहन के स्नेह को सुदृढ़ करता है. पर क्या आप भाई दूज की कथा जानते हैं? नहीं तो हम आपको भाई दूज की प्राचीन कथा बताते हैं. आखिर भाई दूज का क्यों त्यौहार मनाया जाता है.

हिन्दू धर्म में भाई-बहन के स्नेह और सदभाव के प्रतीक दो त्योहार मनाये जाते हैं. एक रक्षाबंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इसमें भाई बहन की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है.

दूसरा त्योहार, ‘भाई दूज’ का होता है. इस पर्व का प्रमुख लक्ष्य भाई तथा बहन के पावन संबंध व प्रेमभाव की स्थापना करना है. इस दिन बहनें भाइयों के स्वस्थ तथा दीर्घायु होने की मंगल कामना करके तिलक लगाती हैं.

भाई दूज कथा
भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था. उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था. यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी. वह उससे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आकर भोजन करो.

अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालता रहा. कार्तिक शुक्ला का दिन आया. यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर, उसे अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया.

यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं. मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता. बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है. बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया.

यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर भोजन कराया. यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर मांगने का आदेश दिया.

यमुना ने कहा कि भद्र! आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो. मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई को आदर सत्कार करके टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे.

यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह की. इसी दिन से पर्व की परम्परा बनी. ऐसी मान्यता है कि जो आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता. इसीलिए भैयादूज को यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है.