धनतेरस पर क्यों होती है माता लक्ष्मी की पूजा, जानें पौराणिक कथा

धनतेरस कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी यानि तेरस के दिन मनाया जाने वाला बहुत ही खास त्यौहार है दरअसल इस दिन से ही दिवाली के त्यौहारों की शुरुआत होती है. भगवान धन्वंतरि को इस त्यौहार का देवता मानते हैं क्योंकि वह इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे जिसका पान कर देवता अमर हुए. लेकिन इस दिन धनादि देव कुबेर और समृद्धि प्रदान करने वाली माता लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है. माता लक्ष्मी की पूजा क्यों की जाती है इस बारे में एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है.

पौराणिक कथा
माता लक्ष्मी की विशेष पूजा तो वैसे दिवाली के दिन की जाती है लेकिन धनतेरस पर माता लक्ष्मी की पूजा करने के पिछे भी एक पौराणिक कथा प्रचलित है. कथा कुछ यूं है कि एक बार भगवान विष्णु मृत्युलोक यानि भूलोक में गमन करने के लिये निकल पड़े. माता लक्ष्मी ने भी निवेदन किया कि वह भी उनके साथ आना चाहती हैं. भगवान विष्णु उनके स्वभाव से परिचित थे इसलिये पहले ही उन्हें आगाह किया कि मैं आपको एक ही शर्त पर साथ लेकर चल सकता हूं. माता लक्ष्मी मन ही मन बहुत खुश हुई कि चलो सशर्त ही सही भगवन साथ ले जाने के लिये तो माने. माता फटाक से बोली मुझे सारी शर्तें मंजूर हैं. भगवान विष्णु ने कहा जो मैं कहूं जैसा मैं कहूं आपको वैसा ही करना होगा. माता बोली ठीक है आप जैसा कहेंगें मैं वैसा ही करूंगी.

दोनों भू लोक पर आकर विचरण करने लगे. एक जगह रुककर श्री हरि ने माता से कहा कि मैं दक्षिण दिशा की तरफ जा रहा हूं. आपको यहीं पर मेरा इंतजार करना होगा. यह कहकर भगवान विष्णु दक्षिण दिशा की तरफ बढ़ गये. अब माता को जिज्ञासा हुई कि दक्षिण दिशा में ऐसा क्या है जो भगवान मुझे वहां नहीं ले जाना चाहते. माता का स्वभाव तो वैसे भी चंचल ही माना जाता है. उनसे वहां पर ज्यादा देर नहीं रुका गया और वे भगवान विष्णु की तरफ ही बढ़ने लगी. आगे जाकर माता को सरसों का खेत दिखाई देता है. उसकी सुंदरता ने माता का मन मोह लिया. वे फूलों को तोड़कर अपना श्रृंगार करने लगीं. इसके बाद वे कुछ ही दूर आगे बढ़ी थी कि गन्ने के खेत उन्हें दिखाई दिये. उन्हें गन्ना चूसने की इच्छा हुई तो गन्ने तोड़कर उन्हें चूसने लगीं ही थी कि भगवान विष्णु वापस आते हुए दिखाई दे जाते हैं.

सरसों के फूलों से सजी माता लक्ष्मी को गन्ना चूसते हुए देखकर भगवान विष्णु उन पर क्रोधित हो गये. भगवान ने कहा कि आपने शर्त का उल्लंघन किया है. मैनें आपको वहां रूकने के लिये कहा था लेकिन आप नहीं रूकी और यहां किसान के खेतों से फूल व गन्ने तोड़कर आपने अपराध किया है. इसकी सजा आपको मिलेगी. भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को 12 वर्ष तक किसान की सेवा करने का शाप दे दिया और स्वंय क्षीरसागर गमन कर गये.

अब विवश माता लक्ष्मी को किसान के घर रहना पड़ा. एक दिन माता लक्ष्मी ने किसान की पत्नी को देवी लक्ष्मी की प्रतिमा की पूजा करने की कही और कहा इससे तुम जो भी मांगोगी तुम्हें मिलेगा. कृषक की पत्नी ने वैसा ही किया. कुछ ही दिनों में उनका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया. हंसी खुशी समृद्धि में 12 साल का समय बीत गया. जब भगवान विष्णु माता लक्ष्मी को लेने के लिये आये तो किसान ने माता को न जाने देने का हठ किया. इस पर माता लक्ष्मी ने कहा कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की तेरस की दिन यदि वह विधिपूर्वक मेरी पूजा करे तो वह उसके घर से नहीं जायेंगी.

लेकिन वह इस दौरान उन्हें दिखाई नहीं देंगी. वह एक कलश की स्थापना करे और उसमें कुछ धन रखे वह धन उन्हीं यानि लक्ष्मी का रूप ही होगा. इस प्रकार तेरस के दिन किसान ने माता के बताये अनुसार ही पूजा कर कलश स्थापना की और किसान का घर धन-धान्य से पूर्ण रहने लगा. तब से लेकर आज तक धनतेरस पर माता लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा भी चली आ रही है.