जानें क्यों कहते हैं छोटी दिवाली को नरक रूप या यम चतुदर्शी

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानि अमावस्या से पूर्व आने वाला दिन जिसे हम छोटी दिवाली के रूप में मनाते हैं. क्या आप जानते हैं इस दिन के महत्व को. शायद बहुत कम लोग इस बारे में जानते हैं होंगे कि इस चतुर्दशी को नरक चतुदर्शी कहा जाता है. असल में धनतेरस से लेकर दिवाली मनाते हुए भैया दूज तक लगातार पर्व रहते हैं इस बीच नरक का नाम कौन लेना चाहेगा. भले ही वह चतुर्दशी के साथ आता हो. लेकिन आपकी जानकारी के लिये बतादें कि यह दिन हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार अपना विशेष महत्व रखता है. इस यम चतुदर्शी व रूप चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है. इस वर्ष यह चतुदर्शी 6 नवंबर को मनायी जायेगी

क्यों कहते हैं नरक चतुर्दशी
माना जाता है कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ही भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था, साथ ही उसके बंदी ग्रह में कैद 16 हजार एक सौ कन्याओं को भी मुक्त करवाया था जिनका विवाह फिर भगवान श्री कृष्ण के साथ किया गया.

नरक चतुर्दशी व्रत कथा
नरक चतुर्दशी के दिन व्रत भी किया जाता है इस बारे में एक कथा भी प्रचलित है. कहानी कुछ यूं है कि बहुत समय पहले रन्ति देव नामक बहुत धर्मात्मा राजा हुआ करते थे. उन्होंनें अपने जीवन में भूलकर भी कोई पाप नहीं किया था. उनके राज्य में प्रजा भी सुख शांति से रहती थी. लेकिन जब राजा की मृत्यु का समय नजदीक आया तो उन्हें लेने के लिये यमदूत आन खड़े हुए. रन्तिदेव यह देखकर हैरान हुए और उनसे विनय करते हुए कहा कि हे दूतो मैनें अपने जीवन में कोई भी पाप नहीं किया है फिर मुझे यह किस पाप का दंड भुक्तना पड़ रहा है जो आप मुझे लेने आये हैं क्योंकि आप के आने का सीधा संबंध यही है कि मुझे नरक में वास करना होगा.

उसके बाद यमदूतों ने कहा कि राजन वैसे तो आपने अपने जीवन में कोई पाप नहीं किया है लेकिन एक बार आपसे ऐसा पाप हुआ जिसका आपको भान नहीं है. एक बार एक विद्वान गरीब ब्राह्मण को आपके द्वार से खाली हाथ भूखा लौट जाना पड़ा था यह उसी कर्म का फल है. तब राजा ने हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना कि की मुझे एक वर्ष का समय दें ताकि मैं अपनी गलती को सुधार सकूं और अनजाने में हुए इस पाप का प्रायश्चित कर सकूं. तब राजा के सत्कर्मों को देखते हुए यमदूतों ने उन्हें एक वर्ष का समय दे दिया. अब राजा अपनी भूल को लेकर काफी पश्चाताप कर रहे थे. साथ ही उन्हें चिंता सता रही थी कि इस पाप से मुक्त कैसे होंगें. वह अपनी चिंताओं को लेकर सीधे ऋषियों के पास पंहुचे.

ऋषि बोले हे राजन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करने से बड़े से बड़ा पाप भी क्षम्य हो जाता है अत: आप चतुर्दशी का विधिपूर्वक व्रत करें और तत्पश्चात ब्रह्माणों को भोजन करवाकर उनसे उनके प्रति हुए अपने अपराध के लिये क्षमा याचना करें. फिर क्या था राजा रन्ति को तो बस मार्ग की तलाश थी उन्होंनें ऋषियों के बताये अनुसार चतुर्दशी का व्रत किया जिससे वे पापमुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ. तब से लेकर आज तक नर्क चतुर्दशी के दिन पापकर्म व नर्क गमन से मुक्ति के लिये कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्दशी का व्रत किया जाता है.

नरक चतुर्दशी व्रत एवं पूजा विधि
नर्क चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तिल के तेल से मालिश कर पानी में चिरचिटा अर्थात अपामार्ग या आंधीझाड़ा के पत्ते डालकर स्नान किया जाता है. स्नानादि के बाद विष्णु और कृष्ण मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन कर पूजा की जाती है. ऐसा करने से पाप तो कटते हैं साथ ही रूप सौन्दर्य में भी वृद्धि होती है. इसलिये इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है. यम देवता पाप से मुक्त करते हैं इसलिये यम चतुर्दशी भी इस दिन को कहा जाता है. भगवान श्री कृष्ण ने 16 हजार एक सौ कन्याओं को मुक्त करवाकर उनसे विवाह किया था जिसके उपलक्ष्य में दियों की बारात सजाकर चतुर्दशी की अंधेरी रात को रोशन किया था इस कारण इसे छोटी दिवाली भी कहा जाता है. नरक चतुर्दशी पर किये जाने वाले स्नान को अभ्यंग स्नान कहा जाता है जो कि रूप सौंदर्य में वृद्धि करने वाला माना जाता है. स्नान के दौरान अपामार्ग के पौधे को शरीर पर स्पर्श करना चाहिये और नीचे दिये गये मंत्र का जाप को पढ़कर उसे मस्तक पर घुमाना चाहिये