कार्तिक मास में गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का करें पाठ, कर्ज से मिलेगी मुक्ति

अगर आप कर्ज से मुक्ति पाना चाहते है तो कार्तिक मास में गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ का नियमित करें. गजेंद्र मोक्ष की कथा का वर्णन श्रीमद भागवत पुराण में है. मान्यता है कि सूर्योदय से पूर्व प्रतिदिन पाठ करें तो बड़ा से बड़ा कर्ज चुक जाता है. इसे कर्ज मुक्ति का अमोघ उपाय बताया गया है. कथा इस प्रकार है-

क्षीरसागर में दस हजार योजन ऊँचा त्रिकुट नामक पर्वत था. उस पर्वत के घोर जंगल में बहुत-सी हथिनियों के साथ एक गजेन्द्र नाम का हाथी निवास करता था. वह सभी हाथियों का राजा था. एक दिन वह उसी पर्वत पर अपनी हथिनियों के साथ झाड़ियों और पेड़ों को रौंदता हुआ घूम रहा था. उसके पीछे-पीछे हाथियों के छोटे-छोटे बच्चे तथा हथिनियाँ घूम रही थी .

धूप के कारण उसे तथा उसके साथियों को प्यास लगी . तब वह अपने समूह के साथ पास के सरोवर से पाने पी कर अपनी प्यास बुझाने लगा. प्यास बुझाने के बाद वे सभी साथियों के साथ जल- स्नान कर जल- क्रीड़ा करने लगे . उसी समय एक बलवान मगरमच्छ ने उस गजराज के पैर को मुँह मे दबोच कर पाने के अंदर खीचने लगा . गजेंद्र ने अपनी पूरी शक्ति लगा कर स्वयं को छुड़ाने की कोशिश की लेकिन असफल रहा . उसके झुण्ड के साथियों ने भी उसे बचाना चाहा पर सफल ना हो सके.

जब गजेंद्र ने अपने आप को मृत्यु के निकट पाया और कोई उपाय शेष नहीं रह गया तब उसने प्रभु की शरण ली और प्रभु की स्तुति करने लगा. जिसे सुनकर भगवान श्री हरि ने स्वयं आकर उसके प्राणों की रक्षा की.

गजेन्द्र के पूर्व जन्म कथा
शुकदेव जी महाराज कहते हैं- हे परीक्षित पूर्व जन्म में गजेंद्र का नाम इन्द्रद्युम्न था. वह द्रविड देश का पाण्ड्वंशी राजा था . वह भगवान का बहुत बड़ा सेवक था. उसने अपना राजपाट छोड़कर मलय पर्वत पर रहते हुए जटाएँ बढ़ाकर तपस्वी के वेष में भगवान की आराधना था. एक दिन वहाँ से अगस्त्य मुनि अपने शिष्यों के साथ गुजरे और उन्होंने राजा को एकाग्रचित होकर उपासना करते हुए देखा. अगस्त्य मुनि ने देखा कि यह राजा अपने प्रजापालन और गृहस्थोचित अतिथि सेवा आदि धर्म को छोड़कर तपस्वी की तरह रह रहा है. अत: वह राजा इन्द्रद्युम्न पर क्रोधित हो गये. और क्रोध में आकर उन्होंने राजा को शाप दिया – कि हे राजन् तुमने गुरुजनों से बिना शिक्षा ग्रहण किये हुए अभिमानवश परोपकार से निवृत्त होकर मनमानी कर रहे हो अर्थात् हाथी के समान जड़ बुद्धि हो गये इसलिये तुम्हें वही अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो’.

राजा ने इस श्राप को अपना प्रारब्ध समझा. इसके बाद दूसरे जन्म में उसे आत्मा की विस्मृति करा देने वाली हाथी की योनि प्राप्त हुई. परन्तु भगवान की आराधना के प्रभाव से हाथी होने पर भी उन्हें भगवान की स्मृति हो ही गयी. भगवान श्रीहरि ने इस प्रकार गजेन्द्र का उद्धार करके उसे अपने लोक में स्थान दिया.

ग्राह पूर्व जन्म कथा
गजेंद्र को जिस ग्राह ने पकड़ा था वह पूर्व जन्म में ‘हूहू’ नाम का श्रेष्ठ गन्धर्व था. एक बार देवल ऋषि जलाशय में स्नान कर रहे थे . उसी जलाशय यह हूहू नामक गन्धर्व ने चुपचाप अंदर जाकर ऋषि के पैर पकड़ लिये और मगर मगर (मगरमच्छ) कहकर चिल्लाने लगा. इससे क्रोधित होकर देवल ऋषि ने हूहू को श्राप देते हुए कहा –हे! हुहु गन्धर्व तुझे लाज नहीं आती. तुझे संत-महात्मा का आदर करना चाहिए और तू मजाक उड़ा रहा है. मगर की तरह आकर मेरा पैर पकड़ता है. अरे दुष्ट! अगर तुझे मगर बनने का इतनी इच्छा है तो तुझे मगर की योनि प्राप्त होगी. शाप मिलते ही वह गंधर्व ऋषि से क्षमायाचना करने लगा. तब ऋषि ने कहा – तू मगर की योनि में जरूर जन्म लेगा लेकिन तेरा उद्धार भगवान के हाथों होगा. इसी ग्राह रूपी हूहू गंधर्व का उद्धार भगवान श्रीहरि ने किया.

साभार -: डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित, प्राध्यापक, केए कॉलेज कासगंज