जानें शनि प्रदोष व्रत का महत्व -पूजा विधि, करें भगवान शिव की आराधना मिलेगा मनोवांछित फल

हिन्दू तिथियों के अनुसार शनि प्रदोष व्रत 13वें दिन यानी त्रयोदशी को किया जाता है. प्रदोष व्रत कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों में रखा जाता है. हिन्दू तिथियों के अनुसार त्रयोदशी माह में दो बार आती है. इसलिए यह व्रत एक माह में दो बार आता है. प्रदोष व्रत में भगवान शिव की आराधना की जाती है.

इस व्रत को करने से मनुष्य पापों से मुक्त हो मोक्ष प्राप्त कर मृत्योपरांत शिव के लोक में जाकर सदा वहीं वास करता है. इस बार प्रदोष व्रत 6 अक्टूबर 2018 यानी शनिवार को है. क्योकि इस बार यह व्रत शनिवार को है इसलिए इस दिन व्रत करने से संतान प्राप्ति की मनोकामना जल्द ही पूर्ण होगी. जानें शनि प्रदोष व्रत का महत्व और पूजा विधि…

शनि प्रदोष व्रत का महत्व

ऐसी मान्यता है कि प्रदोष व्रत करने वाले मनुष्य को दो गायों को दान करने का फल प्राप्त होता है. माना जाता है कि जब चारों ओर अधर्म अपने पांव पसार लेगा और हर जगह गलत कार्य किए जाएंगे. उस समय केवल प्रदोष व्रत कर शिव की उपासना करने वाला व्यक्ति ही शांति पाएगा और सभी प्रकार के अधर्मों से दूर रहेगा.

प्रदोष व्रत को व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है. शास्त्रों के अनुसार मान्यता है कि यह व्रत करने वाला व्यक्ति 84 लाख योनियों के बंधन से मुक्त हो अंत में उतम लोक की प्राप्ति कर अपने मनुष्य जन्म को सफल बनाता है. अगला प्रदोष व्रत 22 अक्टूबर 2018 को है.

शनि प्रदोष व्रत पूजा विधि

  • प्रदोष व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठें.
  • स्नानादि कर पवित्र हो जाएं.
  • ॐ नमः शिवाय का उच्चारण करते हुए शिवलिंग पर जल चढ़ाएं.
  • शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा व फल आदि चढ़ाएं.
  • इस दिन किसी भी प्रकार का आहार न लेने का विधान है. पूरे दिन बिना कुछ खाएं उपवास करें.
  • शाम को सूर्यास्त होने से पहले स्नान करें और सफेद कपड़े पहनें.
  • पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है.
  • पूजन स्थल को गंगाजल से शुद्ध कर, गाय के गोबर से लीपें.
  • वहीं अब पांच रंगों से रंगोली बनाएं.
  • प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग करें.
  • उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ कर पूजा आरम्भ करें.
  • भगवान शिव के मंत्र ऊँ नम: शिवाय का जप करें.