पीडब्ल्यूडी और डीडीएमए ने केदारनाथ धाम में उदककुंड के पुनरुद्धार का काम किया शुरू

लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) और डीडीएमए द्वारा केदारनाथ धाम में उदककुंड के पुनरुद्धार का काम शुरू कर दिया गया है. जून 2013 में आई आपदा के दौरान उदक कुंड भी पूरी तरह तबाह हो गया था. पीडब्ल्यूडी का दावा है कि 4 फीट गहरे और 10-10 फीट चौड़े और लम्बे कुंड का काम डेढ़ सप्ताह में पूरा भी कर दिया जाएगा .इस कुंड पर 300 लोकल पत्थर लगाए जा रहे हैं.

पूर्व में केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने कुंडों का पुनर्निर्माण नमामि गंगे के तहत करने के निर्देश अपने अधिकारियों को दिए थे. जिले के जिलाधिकारी मंगेश घिल्डियाल के अनुसार, केदारनाथ धाम में पहले से यहां के महत्व से जुड़ी सभी स्थानों को संरक्षित और पुनर्जीवित किया जा रहा है, इसके बाद हंसकुंड को खोजने का भी प्रयास किया जाएगा.

आपको बता दें कि जून 2013 में आई आपदा में केदारनाथ स्थित रेतस, हंस, उदक, अमृत और हवन कुंड तबाह हो गए थे. पुनर्निमाण के दौरान अमृत और उदक कुंड तो खोज लिए गए, जिनका पुनर्निर्माण कार्य चल रहा है लेकिन शेष तीन कुंडों का पता लगाने के प्रयास किया जा रहा है. काफी प्रयासों के बाद जब कुंड का सुराग मिला तो सरकार ने इसको पुराने वजूद में लाने का प्रयास शुरू कर दिया.

कहा जाता है कि केदारनाथ में जो भी तीर्थयात्री बाबा केदार के दर्शनों को पहुंचता है, वह उदककुंड का जल अपने घर ले जाता है. यह जल पवित्र माना गया है, जिसको किसी स्थान विशेष या विशेष आयोजन पर शुद्धीकरण के लिए प्रयोग में लाया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिव्य जल को ग्रहण करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है.

ऐसी भी मान्यता है कि मृत्यु के समय यदि संबंधित व्यक्ति के गले में यह जल डाला जाए तो उसे सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है. वर्षों पहले इस कुंड में पारा निकलने की भी बातें सुनी जाती रही हैं. हंस कुंड में पितरों के तर्पण का विशेष महत्व माना गया है जबकि, रेतस कुंड के बारे में मान्यता है कि भगवान शिव के कामदेव को भस्म करने के बाद यहां पर रति ने विलाप किया था. पंचाक्षरी मंत्र ऊं नम: शिवाय का जप करने पर इस कुंड में बुलबुले उठते थे.

2013 में आई आपदा के बाद से अब तक लोगों को उदककुंड के इस ‘करिश्माई’ जल से वंचित रहना पड़ रहा था लेकिन अब जल्द ही तीर्थयात्रियों को उदककुंड के पुण्य लेने का अवसर मिलेगा. अधिकारियों का दावा है कि उदककुंड में प्राचीन काल से निकल रहे जल के संरक्षण के लिए बुनियाद बेहतर कर दी गई है.