पहाड़ों में पारंपरिक तरीके से मनाई जा रही है घी संक्रांति, आज घी नहीं खाया तो…

सौर मासीय पंचांग के अनुसार सूर्य एक राशि में संचरण करते हुए जब दूसरी राशि में प्रवेश करता है तो उसे (सूर्य का संक्रण काल) संक्रांति कहते हैं. इस तरह सालभर में कुल बारह संक्रांतियां होती हैं. इस साल घी संक्रांति 17 अगस्त को मनाया जा रही है.

भाद्रपद (भादो) महीने की संक्रांति को सिंह संक्रांति भी कहते हैं. इस संक्रांति को उत्तराखंड में घी संक्रांति या ओल्गी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है.

यह कृषि और पशुपालन से जुड़ा हुआ एक लोक पर्व है. इस दौरान बरसात के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में बालियां आने लगती हैं, किसान अच्छी फसलों की कामना करते हुए ख़ुशी मनाते हैं. बालियों को घर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर या दोनों ओर गाय के गोबर से चिपकाया जाता है.

बरसात में पशुओं को खूब हरी घास मिलती है, दूध में बढ़ोतरी होने से दही-मक्खन-घी भी प्रचुर मात्रा में मिलता है. अतः इस दिन घी का प्रयोग अवश्य ही किया जाता है. कहा जाता है जो इस दिन घी नहीं खाएगा उसे अगले जन्म में (गनेल) घौंघे (snail) के रूप में जन्म लेना होगा. यह घी के प्रयोग से शारीरिक और मानसिक शक्ति में वृद्धि का संकेत देता है.

इस दिन का मुख्य व्यंजन बेडू की रोटी है. (जो उरद की दाल भिगो कर, पीस कर बनाई गई पिट्ठी से भरवां रोटी बनती है) और घी में डुबोकर खाई जाती है. अरबी के बिना खिले पत्ते जिन्हें गाबा कहते हैं, उसकी सब्जी बनती है, छोटे बच्चों के सिर पर घी लगाया जाता है.

इस पर्व का मूल यद्यपि कृषि और पशुपालन से है तथापि राजाओं के समय में प्रजा अपने राजा को इस अवसर पर भेंट-उपहार दिया करती थी. अपनें खेतों की सब्जियां, मौसमी, फल, घी आदि भेंट दी जाती थी. यही नहीं समाज के अन्य वर्ग शिल्पी, दस्तकार, लोहार, बढई आदि भी अपने हस्तकौशल से निर्मित वस्तुएं भेंट में देते थे और धन धान्य के रूप में ईनाम पाते थे.

जो खेती और पशुपालन नहीं करते थे वे भी इस पर्व से जुड़े रहते थे. क्योंकि इन दोनों व्यवसायों में प्रयोग होने वाले उपकरण यही वर्ग बनाते थे. गृह निर्माण हो या हल, कुदाली, दातुली जैसे उपकरण या बर्तन, बिणुली जैसे छोटे वाद्य यंत्र हों. इस भेंट देने की प्रथा को ओल्गी कहा जाता है.

इसी कारण इस संक्रांति को ओलगिया संक्रांति भी कहते हैं. इसमें समाज के हर वर्ग को विशेष महत्व और सम्मान दिया जाता है और सब मिलकर इस पर्व को मनाते हैं.