जानें रक्षाबंधन से संबंधित कहानियां

रक्षा बंधन की कहानी अत्यधिक रोचक और अद्भुत है. सावन की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षा बंधन का त्यौहार इस बार 26 अगस्त 2018 को है. बचपन से रक्षाबंधन से संबंधित हमने सबसे अधिक जो कहानी सुनी है वह रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूं से संबंधित है.

यह कहानी उस समय को दर्शाती है जब मध्यकालीन युग में राजपूत और मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था. रानी कर्णावती चितौड़ के राजा की विधवा थीं. राजा की अनुपस्थिति में रानी अपने राज्य की रक्षा कैसे करें उन्हें समझ नहीं आ रहा था.

इसलिए उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से खुद को अपनी प्रजा को बचाने के लिए उन्होंने हुमायूं से मदद मांगी. उन्होंने हुमायूं को एक राखी भेजी और उनसे रक्षा के लिए निवेदन किया, रानी की यह राखी पाकर बादशाह ने उन्हें बहन का दर्जा दिया और उनके राज्य को सुरक्षा प्रदान की.

पौराणिक काल से जुड़ी रक्षा बंधन की कहानी
यह वह कहानी है जिसे भारतीय स्कूलों में रक्षाबंधन के समय काफी ज्यादा सुनाया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके अलावा भी हमारे इतिहास में ऐसी कई कहानियां दर्ज हैं जो रक्षाबंधन के त्यौहार की महत्ता दर्शाती हैं. यह कहानियां पौराणिक काल से जुड़ी हैं.

भगवान विष्णु
सबसे पहली कहानी भगवान विष्णु से संबंधित है, जिसके अनुसार राजा बालि ने जब 110 यज्ञ पूर्ण कर लिए तब देवताओं का डर बढ़ गया. उन्हें यह भय सताने लगा कि यज्ञों की शक्ति से राजा बलि स्वर्ग लोक पर भी कब्ज़ा कर लेंगे, इसलिए सभी देव भगवान विष्णु के पास स्वर्ग लोक की रक्षा की फरियाद लेकर पहुंचे.

राजा बलि
जिसके बाद विष्णुजी ब्राह्मण वेष धारण कर राजा बलि के समझ प्रकट हुए और उनसे भिक्षा मांगी. भिक्षा में राजा ने उन्हें तीन पग भूमि देने का वादा किया. लेकिन तभी बलि के गु्रु शुक्रदेव ने ब्राह्मण रुप धारण किए हुए विष्णु को पहचान लिया और बलि को इस बारे में सावधान कर दिया किंतु राजा अपने वचन से न फिरे और तीन पग भूमि दान कर दी.

एक पग में स्वर्ग
इस दौरान विष्णुजी ने वामन रूप में एक पग में स्वर्ग में और दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लिया. अब बारी थी तीसरे पग की, लेकिन उसे वे कहां रखें? वामन का तीसरा पग आगे बढ़ता हुआ देख राजा परेशान हो गए, वे समझ नहीं पा रहे थे कि अब क्या करें और तभी उन्होंने आगे बढ़कर अपना सिर वामन देव के चरणों में रखा और कहा कि तीसरा पग आप यहां रख दें.

पृथ्वी में रहने का अधिकार छीन लिया
इस तरह से राजा से स्वर्ग एवं पृथ्वी में रहने का अधिकार छीन लिया गया और वे रसातल लोक में रहने के लिए विवश हो गए. कहते हैं कि जब बलि रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया और भगवान विष्णु को उनका द्वारपाल बनना पड़ा. इस वजह से मां लक्ष्मी, जो कि विष्णुजी की अर्धांगिनी थी वे परेशान हो गईं.

लक्ष्मी जी की परेशानी
भगवान के रसातल निवास से परेशान लक्ष्मी जी ने सोचा कि यदि स्वामी रसातल में द्वारपाल बन कर निवास करेंगे तो बैकुंठ लोक का क्या होगा? इस समस्या के समाधान के लिए लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय सुझाया. लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे राखी बांधकर अपना भाई बनाया और उपहार स्वरुप अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आईं. उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी, उस दिन से ही रक्षा-बंधन मनाया जाने लगा. आज भी कई जगहे इसी कथा को आधार मानकर रक्षाबंधन मनाया जाता है.

साभार – हरिभूमि