प्रधानमंत्री का साक्षात्कार ”विशुद्ध प्रोपोगंडा’ : शिवसेना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रकाशित साक्षात्कार पर सोमवार को पहली प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाजपा के गठबंधन सहयोगी शिवसेना ने इसे ‘विशुद्ध प्रोपोगंडा’ बताया. शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’, ‘दोपहर का सामना’ में पार्टी ने कहा है, “पत्रकार पीएमओ में प्रश्न भेजते हैं, जिसका लिखित जवाब दिया जाता है. कई इसे एक साक्षात्कार के रूप में बताते हैं. दूसरे शब्दों में यह प्रोपोगंडा है.”

पार्टी ने कहा, “यह चीन, रूस और वामपंथी देशों में होता है, एकतरफा संवाद.”

शिवसेना ने कहा कि यदि सीधी बातचीत हुई होती तो उसमें कई प्रकार के प्रश्न पूछे गए होते और साक्षात्कार करने वाला किसी भी तरह के ‘फर्जी बयान’ को पकड़ लिया होता. “पत्रकारों को यह आजादी अवश्य दी जानी चाहिए.”

पार्टी ने अपने बयान में कहा है, “मौजूदा प्रधानमंत्री इस परंपरा को समाप्त कर देना चाहते हैं. उन्हें जो उचित लगता है, उसी का जवाब देते हैं और साक्षात्कार को उसी हिसाब से प्रकाशित किया जाता है.”

शिवसेना ने कहा कि प्रधानमंत्री ने साक्षात्कार में कहा कि एक वर्ष में 70 लाख नौकरियां सृजत हुईं, जिसमें सितंबर 2017 और अप्रैल 2018 के बीच 45 लाख नौकरियों का सृजन हुआ.

पार्टी ने कहा है, “अगर यह साक्षात्कार आमने-सामने होता तो, पत्रकार को यह पूछने का अवसर मिल सकता था कि किस क्षेत्र में इन नौकरियों का सृजन हुआ है और कैसे इस दावे की पुष्टि हुई है.”

शिवसेना ने कहा, “अगर इतनी नौकरियों का सृजन हो रहा है, तो क्यों बेरोजगार युवा बेरोजगारी और नौकरियों में आरक्षण को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं.”

पार्टी ने कहा है कि नोटबंदी के बाद संगठित और असंगठित क्षेत्रों में काफी ज्यादा नौकरियां समाप्त हुई हैं.

शिवसेना ने कहा है, “मुंबई के महत्वपूर्ण नौकरी सृजन क्षेत्र जैसे निर्माण, उत्पादन, सेवा क्षेत्र अब वीरान हो गए हैं.”

उन्होंने कहा, “हाल ही में मराठा प्रदर्शन के दौरान, औरंगाबाद और पुणे में 500 कारखानों पर हमला किया गया. सरकार की नीतियों को धन्यवाद.”

सामना के अनुसार, “पिछले चार वर्षो में प्रधानमंत्री ने एक भी संवाददाता सम्मेलन आयोजित नहीं किया है, लेकिन अपने मन की बात एक रेडियो कार्यक्रम के जरिए जाहिर करते हैं, जिसके बारे में मीडिया रिपोर्ट करता है. लेकिन इससे मोदी को कोई प्रतिष्ठा नहीं मिली.”

पार्टी के अनुसार, “2014 चुनाव से पहले, मोदी मीडिया के दोस्त थे, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद, वह एक पिंजरे में बंद हो गए हैं..अगर यह चलता रहा, तो कई पत्रकारों को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ सकती हैं.”