शिरडी साई बाबा- सर्वधर्म समभाव का संदेश देता साईं मंदिर

पूरी दुनिया में आध्यात्मिकता की अलख जगाने में भारत का अहम योगदान है. भारत के मंदिर आध्यात्मिकता के केंद्र माने जाते हैं. स्थापत्य कला के भी एक से बढ़ कर एक नमूने इन मंदिरों, मंदिर गुफाओं में देखने को मिलते हैं. भारत में महाराष्ट्र जैसा राज्य जो मायानगरी मुबंई के लिये तो जाना जाता ही है साथ ही इसका अतीत और वर्तमान साधु संतो का अनुयायी रहा है.

महाराष्ट्र में भी अहमदनगर जिला वर्तमान में अपने दो धार्मिक स्थलों के लिये विशेष रुप से चर्चा में रहता है. एक और यहां चर्चित शनि शिंगणापुर मंदिर है तो वहीं सर्वधर्म समभाव का संदेश देने वाले, सबका मालिक एक बताने वाले, मनुष्य मात्र की सेवा कर मानवता की अलख जगाने वाले सांई बाबा का धाम शिरडी भी इसी अहमदनगर जिले के कोपरगांव तालुक में स्थित है. आइये जानते हैं सांई बाबा और उनके पवित्र धाम शिरडी के बारे में.

भारत देश में साधु संतों के जन्म का सटीक ब्यौरा बहुत कम मिलता है ऐसा ही श्री साई बाबा को लेकर भी है. उनकी जन्मतिथि, जन्म स्थान एवं माता-पिता को लेकर कोई भी प्रमाणिक तथ्य किसी को नहीं मिले हैं. हालांकि मानने वाले उन्हें कबीर का अवतार भी मानते हैं. साई बाबा के जीवन पर श्री अन्ना साहेब दाभोलकर द्वारा 1914 में लिपिबद्ध की गई कथा ‘श्री सांई सत्चरित’ को ही एकमात्र प्रामाणिक कृति माना जाता है.

माना जाता है कि सांई का जन्म सन् 1835 में महाराष्ट्र के परभणी जिले के पाथरी गांव के भुसारी परिवार में हुआ. श्री सत्य साई बाबा ने सांई बाबा का जन्म 27 सितंबर 1830 को पाथरी गांव में बताया है. साईं का जन्म 28 सितंबर 1936 को भी माना जाता है, कहा जाता है कि एक बार अपने एक भक्त के पूछने पर साईं ने उन्हें यह तिथि बताई थी इसलिये 28 सिंतबर को ही साईं का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है.

माना जाता है शिरड़ी में सांई 1854 में एक नीम के पेड़ के नीचे बैठे दिखाई दिये. बताया जाता है इस दौरान 1835 से लेकर 1946 तक वे अपने पहले गरु रोशनशाह फकीर के घर रहे एवं उसके बाद 1846 से 1854 तक बाबा बैंकुशा के आश्रम में रहें. 1854 में एक बार शिरड़ी आने के बाद बाबा फिर से कुछ साल तक किसी अज्ञात स्थान पर रहे और 1858 में सांई फिर शिरड़ी आये और यहीं के होकर रह गये.

जब साईं कुछ सालों बाद वापस एक बारात के साथ शिरडी आये तो उन्हें देखते ही खंडोबा मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने कहा ‘आओ साईं’ उनके इस स्वागत संबोधन के बाद सभी इस फकीर को साईं बाबा कहने लगे.एक युवा फकीर जिसने शिरडी की एक जर्जर मस्जिद में अपना डेरा डालकर केवल चार घरों से भिक्षा मांगकर गुजर-बसर करना शुरु किया था आज वही शिरडी पूरी दुनिया में उस युवा फकीर जिसे लोगों ने सांई बाबा का नाम दिये की शिरडी के रुप में जानी जाती है. सांई की दी जड़ी बुटियों ने लोगों पर काफी असर दिखाया और दिन ब दिन उनके मानने वालों की संख्या बढ़ती गई.

सांई भक्तों की खास बात यह है कि उनके बाद किसी एक धर्म, किसी एक जाति क्षेत्र या समुदाय में बंधे नहीं है बल्कि हिंदू जहां उनके चरणों में हार-फूल आदि चढ़ाकर समाधि पर दूब आदि रखकर अभिषेक करते हैं तो वहीं मुस्लिम बाबा की समाधि पर चादर चढ़ाते हैं. उनके अनुयायि अन्य धर्मों से भी हैं कुल मिलाकर सांई जात, धर्म आदि के नाम पर किसी में भेद नहीं करते हैं बल्कि सबका मालिक एक बताते हुए श्रद्धा और सबूरी का संदेश देते हैं. माना जाता है कि उनके दरबार से कोई खाली नहीं जाता.

मान्यता है कि सांई अपने भक्तों की झोली जरुर भरते हैं उन्हें खाली हाथ नहीं लौटाते. इसी कारण उनके इस मंदिर, इस धाम, दरबार में आने वालों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है. एक अनुमान के मुताबिक प्रतिदिन 30 हजार के करीब श्रद्धालु यहां आते हैं. गुरुवार व रविवार को तो यह संख्या लगभग दोगुनी हो जाती है. रामनवमी, गुरुपूर्णिमा और विजयादशमी पर तो यह संख्या लाखों में हो जाती है. अगर पूरे साल में शिरडी सांई धाम आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या देखी जाये तो आंकड़ा करोड़ों में होगा. गर बाबा के कार्यों और उनके संदेश को देखें तो उनका पूरा जीवन जन कल्याण एवं मनुष्य मात्र की सेवा में बीता. उनके संदेश आज भी जनकल्याण करते हैं.