जानें बाबा बर्फानी की कहानी

वैसे तो हिमालय का कण-कण भगवान शिव की अमरकथा का गवाह है लेकिन जहां भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरकथा सुनाई थी वह स्थान है अमरनाथ. यहीं पर स्वयं भगवान शिव बर्फानी बाबा यानि हिम शिवलिंग के रुप में विराजमान हैं. यह भगवान शिव की ही माया है कि बर्फ का यह शिवलिंग प्राकृतिक रुप से ही निर्मित होता रहता है. यहीं पर भगवान गणेश व माता पार्वती की एक पीठ भी है. पार्वती पीठ को तो शक्तिपीठ स्थल भी माना जाता है. कहा जाता है कि यहां पर माता पार्वती के कंठ का निपात हुआ था इसलिये इसकी गिनती देवी की 51 शक्तिपीठों में भी होती है. आइये आपको बताते हैं बाबा बर्फानी की कहानी.

एक बार की बात है माता पार्वती ने भगवान सदाशिव से कहा हे प्रभु अमरेश महादेव की क्या कथा है और वे गुफा में स्थित होते हुए अमरेश कैसे कहलाए ? तब भगवान सदाशिव ने कहा, देवी आदिकल में जब ब्रह्मा उनके साथ प्रकृति फिर इस चराचर जगत की उत्पत्ति हुई. इसी क्रम में देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, राक्षस, सर्प, यक्ष, भूतगण, कूष्मांड, भैरव, गीदड़, दानव आदि उत्पन्न हुए. इस तरह नए भूतों की सृष्टि हुई, लेकिन इंद्रादि देवताओं सहित सभी की मृत्यु निश्चित थी उन्हें हमेंशा मृत्यु का भय सताता रहता.

इसके बाद बाबा भोलेनाथ ने माता पार्वती से कहा कि एक दिन की बात है सभी देवता घबराए हुए उनके पास आये और बोले हे भगवन कोई ऐसा समाधान बताओ जिससे हमें मृत्यु का भय न सताए. तब भगवान सदाशिव ने उनकी रक्षा का वचन देते हुए अपने सिर से चंद्रमा की कला को उतारकर उसे निचोड़ दिया. भगवान शिव ने कहा यह तुम्हारे मृत्यु रोग की औषधि है. इस चंद्रकला के निचोड़ से पवित्र अमृत की धारा बह निकली जो कालांतर में अमरावती नदी के नाम से विख्यात हुई. चंद्रकला को निचोड़ने के दौरान अमृत की कुछ बिंदू भगवान सदाशिव के शरीर पर भी गिरे जो सूख कर पृथ्वी पर गिरे.

पवित्र गुफा में जो भस्म है वह इसी अमृत बिंदु के कण हैं जो पृथ्वी पर गिरे थे. देवताओं पर अपने प्यार की बारिश करते समय वे स्वयं जलस्वरुप हो गए तब देवताओं ने द्रवीभूत हुए शिव की स्तुति की, भगवान सदाशिव ने तब सभी देवताओं से कहा कि हे देवताओं तुमने मेरे बर्फानी स्वरुप को इस गुफा में देखा है इसलिये तुम्हें मृत्यु का भय नहीं सतायेगा अब तुम यही पर अमर होकर स्वयं भी शिव हो जाओ.

आज से मेरा यह अनादि हिमलिंग शरीर समस्त लोकों में अमरेश के नाम से जाना जायेगा. भगवान शिव के इस स्वरुप के दर्शन करने से देवताओं को अमरता मिली इसी कारण उनका नाम अमरेश्वर प्रसिद्ध हुआ.देवताओं को ऐसा वर देकर सदाशिव उस दिन से लीन होकर गुफा में रहने लगे. भगवान सदाशिव ने अमृत रूप सोमकला को धारण कर देवताओं की मृत्यु का नाश किया, तभी से उनका नाम अमरेश्वर प्रसिद्ध हुआ.

अमरनाथ की जिस गुफा में भगवान शिव बर्फानी बाबा के रुप में आज विराजमान हैं यही वो जगह हैं जहां भगवान शिव ने माता पार्वती को मोक्ष का मार्ग दिखाया था. माता पार्वती को जो तत्वज्ञान भगवान शिव ने यहां करवाया उसे ही अमरकथा कहा जाता है इसी कारण इस स्थान का नाम भी अमरनाथ पड़ा. हुआ यूं कि देवी सती जो कि माता पार्वती ही थी उनका पहला जन्म तो दक्ष पुत्री के रुप में हुआ. उनका दूसरा जन्म हिमालयराज के यहां पार्वती के रुप में हुआ. जब भगवान शंकर से उनका विवाह हो गया तो एक दिन उन्होंनें शंकर भगवान से पूछा कि आपके गले में ये नरमुंड की माला क्यों है इसका रहस्य बतलायें तब भगवान शिव ने बताया कि पार्वती जितनी बार भी तुमने जन्म लिया उतने ही मुंड मैंने धारण किये हैं.

तब माता पार्वती कहने लगी हे नाथ मेरा शरीर नाशवान और आप अमर हैं इसका क्या कारण है, मैं भी इस जन्म-मृत्यु के चक्कर से मुक्ति पाना चाहती हूं. भगवान शिव कुछ समय तक माता पार्वती की बात को टालते रहे लेकिन उनकी बढ़ती जिज्ञासा के कारण एक दिन भगवान शिव माता पार्वती को अमरता का रहस्य बताने लगे. उन्होंनें बताया कि यह सब अमरकथा के कारण है. अब अमरकथा सुनाने के लिये यह जरुरी था कि कोई अन्य जीव इस कथा को न सुन सके इसलिये भगवान शिव पंचतत्व को त्याग कर इस गुफा में पंहुचे और अमरकथा सुनाने लगे.

इतना ही नहीं गुफा तक पंहुचने से पहले पहलगाम में भगवान शिव ने नंदी का परित्याग किया फिर चंदनवाड़ी में अपनी जटाओं से चंद्रमा को मुक्त किया. शेषनाग में अपने गले के सभी सर्पों को उतार दिया फिर महागुनस पर्वत पर अपने पुत्र गणेश को उन्होंने छोड़ा और पंचतरणी में पांचो तत्वों का उन्होंने त्याग किया.

जब भगवान शिव शंकर अमृतज्ञान माता पार्वती को सुना रहे थे तो एक शुक का बच्चा भी वहां इस ज्ञान को सुन रहा था. भगवती पार्वती कथा के बीच में हुंकारा भर रही थी लेकिन कथा सुनते-सुनते उन्हें नींद आ गई और वहां मौजूद शुक ने माता पार्वती की जगह हुंकारे भरना शुरु कर दिया. जब भगवान शिव को इसकी भनक लगी तो वे शुक को मारने के लिये दौड़ पड़े शुक जान बचाने के लिये तीनों लोकों में दौड़ता रहा. भगवान शिव ने अपना त्रिशुल शुक के पिछे छोड़ दिया अब शुक अपनी जान बचाने के लिये महर्षि व्यास के आश्रम में पंहुचा और सूक्ष्म रूप धारण कर उनकी पत्नी वटिका के मुख में घुस गया.

ऐसा माना जाता है 12 वर्षों तक वह व्यास जी की पत्नी वटिका के गर्भ में रहा और भगवान शिव के भय से बाहर नहीं निकला फिर एक दिन स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने उस पर माया का प्रभाव न पड़ने का आश्वासन देते हुए बाहर निकालने की कही. श्री कृष्ण के कहने पर ये गर्भ से बाहर निकले और महर्षि व्यास जी के पुत्र कहलाये. जन्म के बाद ही ये भगवान श्री कृष्ण और माता-पिता को प्रणाम कर जंगल में तपस्या के लिये निकल गये जो बाद में शुकदेव मुनि के नाम से जगत प्रसिद्ध हुए.

मान्यता है कि यात्रा के दौरान अमरनाथ गुफा में ही युगल कबूतरों के दर्शन भी होते हैं. वैसे यह भी विचारणीय है कि जहां इतनी ठंड हो और सांस लेना भी जहां मुश्किल हो ऐसे वातावरण में ये कबूतर कैसे जीवित रहते हैं इसलिये इसे भगवान भोलेनाथ की ही लीला मानते हैं और कहा जाता है कि जिसे भी पवित्र गुफा में कबूतरों का यह जोड़ा दिखाई दे वह बहुत भाग्यशाली है. स्वयं भगवान शिव और पार्वती के दर्शन करने जैसा ही पवित्र युगल कबूतरों का दर्शन करना भी माना जाता है. इन युगल कबूतरों से भी एक कथा जुड़ी हुई है-

हुआ यूं कि एक बार महादेव संध्या बेला में नृत्य कर रहे थे कि भगवान शिव के गण आपस में ईर्ष्यावश कुरु-कुरु की ध्वनि निकालने लगे तब भगवान शिव ने उन्हें शाप दिया कि तुम दीर्घकाल तक इसी तरह कुरु-कुरु करते रहो. माना जाता है कि उसी समय वे गण कबूतर हो गये और गुफा में ही उनका स्थायी निवास हो गया.

अमरनाथ की पवित्र गुफा तक पहुंचने के लिये वैसे तो दो रास्ते हैं पहला है पहलगाम यह थोड़ा लंबा तो है लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से ठीक माना जाता है. सरकार भी इसी रास्ते से अमरनाथ जाने के लिये लोगों को प्रेरित करती है. इसी रस्ते से जाते हुए कई दर्शनीय स्थल भी आते हैं अनंतनाग, चंदनवाड़ी, पिस्सु घाटी, शेषनाग, पंचतरणी आदि. ऑक्सीजन की कमी और ठंड कई बार यात्रियों के लिये परेशानी भी बन जाती है इसलिये यात्री सुरक्षा के तमाम इंतजाम साथ लेकर चलते हैं. वहीं दूसरा रस्ता सोनमर्ग बलटाल से होकर जाता है.

यहां से जाने वाला रास्ता काफी जोखिम भरा माना जाता है इसलिये खतरों के खिलाड़ी ही इस रस्ते का रोमांच लेते हैं. यहां से जाने वाले यात्रियों की सुरक्षा का जिम्मा खुद यात्री ही उठाते हैं, सरकार किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी नहीं लेती. हालांकि यहां से अमरनाथ गुफा में दर्शन करके सिर्फ एक दिन में ही वापस कैंप पर लौटा जा सकता है.