International Yoga Day 2018 : पीएम  मोदी ने ॐ के उच्चारण के साथ हजारों स्वयंसेवियों के साथ योगासन किया

गुरुवार 21 जून को विश्वभर में चौथे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2018 के उपलक्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ॐ के उच्चारण के साथ उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में हजारों स्वयंसेवियों के साथ योगासन किया. यह कार्यक्रम हिमालय की गोद में स्थापित वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) में आयोजित किया गया है.

मोदी ने इससे पहले 2015 में नयी दिल्ली के राजपथ, 2016 में चंडीगढ के कैपिटल कांप्लैक्स और 2017 में लखनऊ के रामाबाई अंबेडकर सभा स्थल में योग कार्यक्रमों में भाग लिया था. वहीं योग दिवस के मौके पर राजस्थान के कोटा जिले में योगगुरु बाबा रामदेव दो लाख से अधिक लोगों के साथ योग कर रहे हैं.

बीएसएफ के जवानों ने भी योग किया. इसके अलावा 18000 फिट पर भारतीय जवानों ने योग किया.

योग करने से पहले पीएम मोदी ने लोगों को संबोधित करते हुआ कहा कि योग करने से मानवता का कल्याण होता है और परिवार में खुशहाली आती है. पीएम मोदी ने कहा कि दुनिया में हर जगह योग से सूर्य का स्वागत हो रहा है.
भारतीय संस्कृति मूलत: लोककल्याण की भावना पर आधारित है. लोककल्याण हेतु वह बाह्य आचार–विचार के साथ–साथ आन्तर औदात्य रूप को भी स्वीकार करती है. इसी रूप प्रक्रिया के तहत वह एक खुशहाल जन–गण–मन से परिपूरित राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य को अपने हृदय में सदा से धारण किए हुए है.इस संदर्भ में भारतीय ऋषि-मुनियों के नि:स्पृह अवदान को विस्मृत नही किया जा सकता है. महर्षि पंतजलि ने अपने योगसूत्र में‘योगष्चित्तवृत्तिनिरोध:’ कहकर भारतीय संस्कृति की आचार संहिता को महिमा मंडित किया है. चित्त में उत्पन्न होने वाली सभी अमंगल वृत्तियों का निषेध करने में योग सक्षम है.

हालाकि साधारणत: योग को लोग ‘शारीरिक कसरत के रूप में स्वीकार करते हैं. बात भी सौ फीसदी सही है कि शारीरिक स्वस्थता प्राथमिक है परंतु योग शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करने के साथ विचारों को भी उदात्त बनाता है. यह केवल गप नहीं बल्कि कसौटी में परखा गया तथ्य है. इसी महत्ता को मद्देनजर रखते हुए भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में अपना यह उद्गार प्रगट किया था कि योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है. यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है, मनुष्य और प्रकृति के बीच समांजस्य है, विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है. यह व्यायाम के बारे में नहीं है लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है.

हमारी बदलती जीवन शैली में यह चेतना बनकर हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है.’ योग के संदर्भ में इस ऐतिहासिक वक्तव्य से चमत्कृत हो संयुक्त राष्ट्र संघ के 177 सदस्यों ने 11 दिसम्बर 2014 को एक मत से प्रतिवर्ष 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया जिसमें 47 मुस्लिम देश भी ‘शामिल थे. धर्म, जाति, वर्ग, वर्ण, सम्प्रदाय या किसी प्रकार की विशमताओं या भेदक दृष्टिकोण से रहित इस भारतीय योग ने अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर अल्प समय में अपनी विजय पताका फहरा दिया. इतना ही नही 21 जून 2015 को प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय दिवस पर एक साथ एक स्थान पर 36 हजार लोगों ने प्रधानमंत्री के साथ 21 प्रकार के योग आसन करके गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में अपना नाम भी दर्ज करा लिया. भारतीय योग विद्या भारतीय ऋषियों के जीवन शैली की आधार शिला थी. वैदिक काल से लेकर आज तक योग का ग्राफ निरंतर उपर ही उठता गया है.

हां यह जरूर है कि 21वीं सदी में इसकी जरूरत कुछ ज्यादा हो गयी है क्योंकि आज विश्व समाज जितना अधिक रोगी, अशांत, तनावयुक्त एवं भयभीत है – शायद मानव इतिहास में पहले ऐसा कभी न हुआ. अल्पश्रम, समय और साधन में सब कुछ पा लेने की अति महत्वाकांक्षा से समाज दिग्भ्रमित है. मानों बनारस की गाड़ी में बैठकर मुंबई पहुंचने की निष्फल योजना संजो रखी हो. मानव को मशीन में परिणत कर देने वाली पश्चिमी जीवन ‘शैली ने लोगों को उबाऊ, रसहीन जीवन जीने को मजबूर कर दिया है. ऐसे में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर योग को अपना लेने की सक्रिय परिकल्पना वैष्विक स्वस्थता के लिए अत्यंत साधक एवं लाभदायक है. इसे धारण कर व्यक्ति एक आदर्ष मनु”य बन प्रेरणार्थक जीवन शैली से परिपूर्ण हो भारतीय संस्कृति की लोककल्याण की अवधारणा को सार्थक बनाने में अपना अमूल्य योगदान दे सकता है.

सामान्यत: महर्षि पंतजलि निर्देशित योगसूत्र के 8 अंग है. – ‘यमनियमासन – प्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाध्योऽष्टाङगानि.’’ इस अष्टांग योग के माध्यम से व्यक्ति सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय अपरिग्रह का निरंतर अभ्यास कर, शौच, संतोश, तप, स्वाध्याय से कर्तव्यपरायण बन, स्थिर चित्त वृत्ति से अपने ‘वासों पर नियंत्रण रख, विषयजनित इ्द्रिरयों को संतुलित कर मंगल ध्येय के लिए समाधिस्थ हो जाता है. योग ग्रंथों के अनुसार हमारे ‘शरीर में 70 हजार नाडि़यां है. दुनिया में ऐसी कोई औशधि नहीं बनी जो इन नाडि़यों में एक साथ संतुलन स्थापित कर सके. इसका नियमन केवल योग ही कर सकता है. मानव विज्ञान एवं मानव सभ्यता के लिए यह अद्भुत वरदान है. बाह्य जगत व्यापार के पर्यवेक्षण के लिए हजारों अत्याधुनिक यंत्र हैं पर अन्तर्जगत व्यापार की समझ और परख को उदात्त बनाने के लिए योग ऐसा यंत्र है जो मन की बिखरी ‘व्यक्तियों को पूंजीभूत कर आलोक प्रदान कर सकता है.

योग विशाक्त को माधुर्य, कृपणता को औदात्य, भटकाव को ठहराव, रूदन को उल्लास, आलस्य को गति, उद्दंड को नीति में परिवर्तित कर सकता है. इसके तमाम फायदे हैं जिसकी गणना असंभव है. इसी कारण आज दुनियां में इसे लेकर दीवानगी देखी जा रही है. ऑफ लाइन योग अब ऑनलाइन योगा हो देखा और सीखा जा रहा है.
तमाम बेबसाइटस, यूट्यूबस, मोबाइल एप्स आदि के द्वारा विभिन्न योग पद्दतियों को बेहद आसान संवादात्मद्क शैली में लोगों को उपलबध कराकर जनकल्याण का काम किया जा रहा है. अभी योग मानव को मानवीय प्रकृति को उन्मुख करने का जिस प्रकार स्तुत्य कार्य कर रहा है, उससे लगता है कि भारतीय संस्कृति के हृदय में धारित एक खुशहाल जन–गन–मन से परिपूरित राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य ‘शीघ्र साकार होगा क्योंकि योग: कर्मसु कौषलम्.