राष्ट्रवाद किसी धर्म से नहीं बंधा, पढें आरएसएस के कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का भाषण

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अपने बहुप्रतिक्षित भाषण में राष्ट्रवाद पर एक लंबा आख्यान दिया। प्रणव मुखर्जी ने अपने संबोधन की शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया कि वह नेशन (देश), नैशनलिज्म (राष्ट्रवाद) और पैट्रियॉटिज्म (देशभक्ति) पर बात करने आए हैं। प्रणव मुखर्जी ने कहा कि राष्ट्रवाद किसी धर्म या भाषा में नहीं बंटा है। पूर्व राष्ट्रपति अपने भाषण में भारतीय राज्य को प्राचीन महाजनपदों, मौर्य, गुप्त, मुगल और ब्रिटिश शासन से होते हुए आजाद भारत तक लेकर आए। मुखर्जी ने अपने भाषण में तिलक, टैगोर, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू समेत अन्य विद्वानों को कोट करते हुए राष्ट्रवाद और देश पर अपनी राय रखी।

आपको बता दें कि प्रणव मुखर्जी के संघ के कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था। कांग्रेस के कई नेताओं ने मुखर्जी को संघ के कार्यक्रम में शामिल नहीं होने का सुझाव दिया था। प्रणव मुखर्जी की बेटी और कांग्रेस नेत्री शर्मिष्ठा मुखर्जी ने भी कुछ ऐसी ही अपील की थी। इन सबके बावजूद मुखर्जी कार्यक्रम में शामिल हुए और देशभक्ति पर एक लंबा व्याख्यान दिया। संघ के कार्यक्रम में मौजूद स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि आपलोग अनुशासित और ट्रेंड है, शांति और सौहार्द के लिए काम कीजिए।

मुखर्जी बोले, धर्म , हठ और असहिष्णुता के माध्यम से भारत को परिभाषित करना इसे कमजोर करेगा
पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी ने कहा कि धर्म, मतभेद और असिहष्णुता से भारत को परिभाषित करने का हर प्रयास देश को कमजोर बनाएगा। मुखर्जी ने कहा कि असहिष्णुता भारतीय पहचान को कमजोर बनाएगी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय पहचान और भारतीय राष्ट्रवाद सार्वभौमिकता और सह-अस्तित्व से पैदा हुआ है.

प्रणव मुखर्जी ने अपने संबोधन में प्राचीन भारत का जिक्र करते हुए कहा कि हमारा समाज शुरू से खुला रहा है. सिल्क और स्पाइस रूट जैसे माध्यमों से संस्कृति, विचारों सबका आदान-प्रदान हुआ. मुखर्जी ने कहा कि भारत से होकर हिंदुत्व के प्रभाव वाला बौध धर्म सेंट्रल एशिया, चीन तक पहुंचा. उन्होंने मेगस्थनीज, फाहयान जैसे विदेशी यात्रियों का जिक्र करते हुए कहा कि इन सभी ने प्राचीन भारत के प्रशासन और बढ़िया इन्फ्रास्ट्रक्चर की तारीफ की. पूर्व राष्ट्रपति ने प्राचीन भारत के एजुकेशन सिस्टम का जिक्र करते हुए तक्षशिला और नालंदा का नाम लिया और कहा कि प्राचीन भारत के यूनिवर्सिटी सिस्टम ने दुनिया पर राज किया.

यूरोपीय राष्ट्रवाद से प्राचीन हमारा राष्ट्रवाद: प्रणव मुखर्जी ने कहा कि 17वीं सदी में वेस्टफेलिया के समझौते के बाद अस्तित्व में आए यूरोपीय राज्यों से भी प्राचीन हमारा राष्ट्रवाद है. उन्होंने कहा कि यूरोपीय विचारों से अलग भारत का राष्ट्रवाद वसुधैव कुटुंबकम पर आधारित है और हमने पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखा है. मुखर्जी ने कहा कि हमारे देश की राष्ट्रीय पहचान किसी खास धर्म, भाषा या संस्कृति से नहीं हो सकती.

मुखर्जी ने प्राचीन भारत में महाजनपद से शुरू कर देश की एकता का जिक्र किया. इस क्रम में उन्हें मौर्य, गुप्त, मुस्लिम, कंपनी और ब्रिटिश शासन के समय के इतिहास का भी जिक्र किया. मुखर्जी ने कहा कि इन सबके बीच में एक बात याद रखनी चाहिए कि 2500 साल तक लगातार शासन बदलते रहे लेकिन 5000 सालों पुरानी हमारी सभ्यता नहीं टूटी, बची रही. मुखर्जी ने टैगोर की पंक्तियों को दोहराते हुए कहा कि मानवता की न जाने कितनी धाराएं पूरे विश्व से आईं और उस महासागर में समा गईं जिसे हम भारत कहते हैं.

प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्रवाद और देशभक्ति के संदर्भ में आजादी से पहले कांग्रेस के प्लैटफॉर्म से सुरेंद्र नाथ बनर्जी के अध्यक्षीय भाषण, तिलक के स्वराज, गांधी के राष्ट्रवाद और नेहरू की किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि नेहरू ने अपनी किताब में लिखा है कि भारत का राष्ट्रवाद हिंदू, मुस्लिमस, सिख और दूसरे तमाम समूहों से मिलकर बनता है. पूर्व राष्ट्रपति ने आजादी के बाद राष्ट्रीय एकीकरण और राष्ट्रवाद में सरदार पटेल के प्रयासों को भी याद किया.

मुखर्जी ने कहा कि आजादी के बाद मिला लोकतंत्र हमारे लिए गिफ्ट नहीं है. भारतीय संविधान केवल प्रशासन के लिए ही नहीं है बल्कि करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधि है. 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान अस्तित्व में आया. हमने संप्रभु लोकतांत्रिक राज्य में भरोसा जताया. हमारे यहां संवैधानिक देशभक्ति है. मुखर्जी ने कहा कि यह महान आश्चर्य है कि 1.3 अरब लोग, जो 122 से अधिक भाषाएं बोलते हैं, 1600 बोलियों का उपयोग करते हैं, सात प्रमुख धर्मों की प्रैक्टिस करते हैं और तीन प्रमुख जातीय समूहों से आते हैं, एक सिस्टम, एक झंडे, और एक पहचान भारतीयता के अधीन रहते हैं.

मुखर्जी ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता हमारे विश्वास की बात है. हम बहस करते हैं, संवाद जरूरी है. समस्याओं के समाधान की समझ बातचीत से ही विकसित होगी. मुखर्जी ने कहा कि आज हमारे चारों तरफ हिंसा बढ़ रही है. सामाजिक तानाबाना टूट रहा है, हम हिंसा देख रहे हैं. हम लोगों को पब्लिक डिस्कोर्स को हिंसा से मुक्त कराना होगा. अहिंसा वाला समाज ही लोगों की लोकतंत्र में भागीदारी सुनिश्चित करेगा. मुखर्जी ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था तो तेजी से बढ़ रही है लेकिन नागरिकों को खुशी नहीं मिल रही है. हम हैपीनेस रैंकिंग में 133वें नंबर पर हैं.

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि अगर आप संसद में जाएंगे तो गेट नंबर 6 पर लिफ्ट के ऊपर संस्कृत में एक श्लोक लिखा है. उन्होंने वहां लिखे कौटिल्य के श्लोक ‘प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम, नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम’ का जिक्र करते हुए कहा कि प्रजा के हित और सुख में भी राजा का सुख निहित है. उन्होंने कहा कि आधुनिक लोकतंत्र के पैदा होने से बहुत पहले कौटिल्य ने लोगों को केंद्र में रखा.