सात साल में उत्तराखंड के 700 और गांव हो गए वीरान, पांच पहाड़ी जिलों के हालात चिंताजनक

उत्तराखंड में पलायन के कारण भुतहा गांवों (घोस्ट विलेज, यानी वीरान हो चुके गांव) की संख्या बढ़कर अब 1668 पहुंच गई है. ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की रिपोर्ट पर गौर करें तो पिछले सात सालों में 700 गांव वीरान हो चुके हैं. इससे पहले वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में भुतहा गांवों की संख्या 968 थी.

यही नहीं, रिपोर्ट में यह भी जिक्र है कि राज्य के पांच पहाड़ी जिलों रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़ व अल्मोड़ा में पलायन की चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आई है. यहां के गांवों में पलायन राज्य औसत से कहीं अधिक है. सुकून इस बात का है कि पहाड़ के गांवों से 70 फीसद लोगों का पलायन राज्य में ही हुआ है, जबकि 29 फीसद ने राज्य से बाहर और एक फीसद ने विदेश में पलायन किया है.

ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. एसएस नेगी द्वारा प्रदेश के 7950 गांवों के सर्वे के आधार पर पलायन को लेकर तैयार की गई रिपोर्ट पर आयोग के अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अनुमोदन दे दिया है. उन्हें यह रिपोर्ट 20 अप्रैल को सौंपी गई थी.

रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि राज्य के सभी गांवों से पलायन हो रहा है, लेकिन पांच पर्वतीय जिलों में स्थिति बेहद खराब है. यहां राज्य औसत से अधिक पलायन हुआ है. राज्य औसत एक गांव से 60 लोगों का पलायन है. इस लिहाज से रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़ व अल्मोड़ा जिलों के गांवों से प्रति गांव इससे कहीं अधिक पलायन हुआ है. कुछ गांव तो शत-प्रतिशत खाली हो चुके हैं.

रिपोर्ट के अनुसार इन पांच जिलों को छोड़ बाकी आठ जिलों में पलायन राज्य औसत से कम है. सुकून की बात यह है कि राज्य के गांवों से 70 फीसदी पलायन राज्य में ही हुआ. इससे छोटे-छोटे कस्बों में बसागत तेजी से बढ़ी है. यही नहीं, 29 फीसद लोग ऐसे हैं, जिन्होंने राज्य से बाहर पलायन किया है. एक फीसद लोग ऐसे भी हैं, जो विदेशों में गए हैं. रिपोर्ट में उल्लेख है कि 50 फीसद लोगों ने आजीविका के लिए गांव छोड़ा, जबकि 73 फीसद ने बेहतर शिक्षा के उद्देश्य से. इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधा के अभाव के चलते करीब 10 फीसद लोग पलायन को विवश हुए.

राज्य में भले ही घोस्ट विलेज की संख्या में इजाफा हुआ हो, लेकिन 900 गांव ऐसे भी हैं, जहां रिवर्स माइग्रेशन हुआ है. इन गांवों में दो-दो, चार-चार परिवार ऐसे हैं, जो पहले गांव छोड़कर चले गए थे और अब वापस लौट आए हैं.

आयोग की रिपोर्ट में एक दिलचस्प खुलासा भी हुआ है. राज्य के गांवों से जहां लोग पलायन कर रहे हैं, वहीं बाहर से आए लोगों की यहां बसावट हो रही है. सूत्रों के मुताबिक रिपोर्ट में उल्लेख है कि तमाम गांवों में नेपाल और बिहार के लोग आकर बसे हैं, जो आजीविका के लिहाज से नजीर बने हैं.

पलायन आयोग की रिपोर्ट को आयोग के अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री का अनुमोदन मिलने के बाद अब इसे चार या पांच मई को सार्वजनिक किया जाएगा. आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. एसएस नेगी ने इसकी पुष्टि की.