पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में पहाड़ों से गैर जैसा बर्ताव, विकास कार्यों में मैदानी जिलों से पिछड़े पहाड़

पलायन की मार से बेहाल होकर जन सांख्यिकी में बेहद पिछड़ना पर्वतीय जिलों को फिर भारी पड़ गया है. नतीजा नीति आयोग की ओर से हाल ही में जारी विकासाकांक्षी जिलों (पिछड़े जिलों के स्थान पर नया नामकरण) की सूची में उत्तराखंड के नौ पर्वतीय जिले पिछड़ गए, जबकि आबादी के लिहाज से दबदबा रखने वाले जिले हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को इसमें शामिल किया गया है.

प्रति व्यक्ति आय, सकल घरेलू उत्पाद में कई गुना बढ़त वाले ये जिले भूमिहीन श्रमिकों की बड़ी आबादी के साथ ही स्वास्थ्य व पोषण में पिछड़ने के कारण नीति आयोग की सूची में स्थान बना पाए हैं. वहीं ढांचागत सुविधाओं की कमी और बुनियादी जरूरतों की गुणवत्ता के निम्न स्तर के बावजूद विकास की अपेक्षा की दौड़ में पहाड़ी जिले फिसड्डी साबित हो गए.

खास बात ये है कि गैरसैंण में विधानसभा सत्र के दौरान पेश आर्थिक सर्वेक्षण में समाजार्थिक विषमता का जिक्र होने के बावजूद नेतागण राज्य के पिछड़े जिलों की सूची का दायरा बढ़ाने को लेकर नीति तय नहीं कर पाए.

नीति आयोग ने वंचितों, स्वास्थ्य एवं पोषण, शिक्षा, ढांचागत सुविधाओं के जिन सूचकांकों के आधार पर विकासाकांक्षी जिलों की देशभर में रैंकिंग तैयार की है, उनमें पर्वतीय जिले अपेक्षाकृत रूप से पिछड़ गए. खासतौर पर हिमालयी राज्य उत्तराखंड का एक भी पर्वतीय जिला आयोग की ओर से चिन्हित जिलों में जगह बनाने में कामयाब नहीं हो पाया है.

इसकी वजह आयोग की ओर से जो समग्र सूचकांक (कंपोजिट इंडेक्स) तैयार किया गया है, उसमें बुनियादी जरूरतों और अवस्थापना सुविधाओं की कमी पर कहीं न कहीं जनसांख्यिकी को अधिक तवज्जो देना बताया जा रहा है. राज्य सरकार की ओर से विधानसभा में पहली बार पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में उत्तराखंड में मैदानी और पर्वतीय जिलों के बीच समाजार्थिकी विषमताओं की साल-दर-साल चौड़ी होती खाई की ओर ध्यान खींचा गया है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक बिजली, पानी, सड़क की उपलब्धता हो अथवा इन बुनियादी सेवाओं की आपूर्ति की गुणवत्ता, इन मामलों में पर्वतीय जिले मैदानी जिलों की तुलना में कहीं ज्यादा पिछड़े हुए हैं. यही नहीं आर्थिक विकास के मानकों में प्रति व्यक्ति आय या सकल घरेलू उत्पाद हरिद्वार, ऊधमसिंहनगर और देहरादून के आगे शेष दस जिले कहीं नहीं ठहरते.

ग्रामीण या शहरी दोनों ही स्तरों पर गरीबी पर्वतीय जिलों को ज्यादा रुला रही है. यह अंदाजा इससे लग सकता है कि पर्वतीय क्षेत्र में प्रति सौ व्यक्तियों में 19 से ज्यादा तो मैदानी क्षेत्रों में प्रति सौ व्यक्तियों में 15 से ज्यादा गरीब हैं. गरीबी के मामले में पौड़ी जिले में सर्वाधिक 29.36 फीसद लोग गरीब हैं, जबकि प्रति व्यक्ति आमदनी में रुद्रप्रयाग जिला सबसे फिसड्डी है. वहीं सबसे अधिक आय वाले जिलों में शामिल ऊधमसिंहनगर, हरिद्वार व देहरादून सबसे कम आय वाले जिलों से तीन गुना से ज्यादा अंतर से आगे हैं.

वर्ष 2016-17 के आंकड़ों के मुताबिक राज्य के दस पर्वतीय जिलों में प्रति व्यक्ति आय राज्य की औसत प्रति व्यक्ति आय 1,61,102 से कम आंकी गई है.

जनसंख्या, आर्थिक स्तर और मूलभूत सुविधाओं संबंधी सूचकांकों में विषमता का असर समग्र सूचकांक में पर्वतीय और मैदानी जिलों के बीच विकास में बड़ा अंतर स्पष्ट कर रहा है। प्रति व्यक्ति बिजली का उपभोग हो, प्रति दस हजार की जनसंख्या पर सड़क सुविधाओं की उपलब्धता हो या आवास परिसर के भीतर पेयजल की उपलब्धता हो, पर्वतीय क्षेत्र साफतौर पर पिछड़े नजर आ रहे हैं.

इसके बावजूद नीति आयोग के नए पैमाने ने विकासाकांक्षी जिलों की दौड़ में पर्वतीय जिलों को पीछे धकेल दिया है. ऐसे में यदि विकास की मुहिम सिर्फ जनसंख्यिकी के बूते बेहतर आर्थिक स्तर के बावजूद मैदानी जिलों पर केंद्रित होती है तो आने वाले समय में पर्वतीय क्षेत्रों के लिए दिक्कतें बढ़ना तय है. रिवर्स माइग्रेशन की शब्दावली के बूते पर्वतीय क्षेत्रों के हालत सुधरने की उम्मीद तो भूल ही जाएं.