1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की शत्रु संपत्ति को सरकार बेचने की तैयारी में

49 साल पुराने शत्रु संपत्ति अधिनियम पर संसद में बीते सप्ताह बदलाव किया गया था. इसके तहत देश विभाजन के दौरान पाकिस्तान और चीन जाने वाले लोगों के उत्तराधिकारियों का इन संपत्तियों से दावा खत्म हो जाएगा. सरकार इन संपत्तियों को अपने कब्जे में लेकर बेचने की तैयारी में है.

1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद भारत सरकार ने इन देशों के नागरिकों की संपत्तियों को सीज कर दिया था. इन संपत्तियों को शत्रु संपत्ति करार दिया गया है. इन संपत्तियों में भूमि, मकान, फर्म, शेयर, बैंक बैलेंस, प्रविडेंट समेत कई अन्य चीजें शामिल हैं. फिलहाल इन संपत्तियों की देखरेख की जिम्मेदारी कस्टोडियन ऑफ एनमी प्रॉपर्टी फॉर इंडिया के पास है. युद्ध के दौर में चीन और पाक छोड़ने वाले भारतीयों की संपत्ति की सुरक्षा करने में असफल रहने के बाद भारत सरकार ने यह कदम उठाया था.

लोकसभा में एक सवाल के जवाब में दी गई जानकारी में गृह मंत्रालय ने देश में 9,280 अचल शत्रु संपत्तियों की जानकारी दी थी. ये सभी संपत्तियां पाकिस्तानी नागरिकों से संबंधित हैं. यह कुल संपत्ति 12,000 एकड़ में फैली है और इनकी कीमत 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की है.

भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में हुए युद्ध के बाद ताशकंद समझौते में इस बात पर सहमति बनी थी कि दोनों देश विवाद के दौरान जब्त की संपत्तियों और एसेट्स को वापस लौटाएंगे. हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस समझौते पर अमल न करते हुए 1971 में भारतीयों नागरिकों और कंपनियों से संबंधित संपत्तियों को बेच दिया. दूसरी तरफ भारत में यह संपत्तियां अब भी कस्टोडियन ऑफ एनमी प्रॉपर्टी के नियंत्रण में ही हैं.

उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में ऐसी 80 फीसदी संपत्तियां हैं. इनमें से तकरीबन 98 फीसदी पाकिस्तान नागरिकों से संबंधित हैं. ऐसा नहीं है. इससे पहले दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने 1939 में डिफेंस ऑफ इंडिया ऐक्ट लागू किया था. इसके तहत जर्मनी, जापान और इटली के नागरिकों की संपत्ति को एनमी प्रॉपर्टी घोषित कर दिया गया था. ऐसा इसलिए किया गया ताकि इन देशों के नागरिक भारत से कोई वित्तीय लाभ न ले सकें. देश की आजादी के बाद यह ऐक्ट समाप्त हो गया था.