मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग की तैयारी, आज राज्यसभा में हो सकती है बहस

मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देने के साथ-साथ विपक्ष ने देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने की भी तैयारी कर ली है। माना जा रहा है कि कांग्रेस, एनसीपी, वामदल के कुछ नेताओं ने महाभियोग के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. एनसीपी के सांसद माजिद मैमन ने इसकी पुष्टि की.

मंगलवार देर रात तक जरूरी 50 सांसदों के हस्ताक्षर लेकर बुधवार को ही राज्यसभा में नोटिस दिया जा सकता है. हालांकि इसकी संभावना कम है क्योंकि कुछ दलों का मानना है कि ऐसा प्रस्ताव लाने से पहले विस्तार से चर्चा कर लेनी चाहिए. अगर विपक्ष आगे बढ़ता है तो वह पहले मुख्य न्यायाधीश होंगे, जिनके खिलाफ ऐसा प्रस्ताव आएगा. इससे पहले दो न्यायाधीशों के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव आया था.

वैसे तो जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग की बात वामदल की ओर से तब उठाई गई थी जब जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे. लेकिन पिछले दो तीन दिनों में संसद के अंदर विपक्ष ने इसे धार दी है. बताते हैं कि कांग्रेस की ओर से इसकी शुरुआत की गई, ताकि दूसरे दल भी इसका समर्थन करें. वकील प्रशांत भूषण ने इसका एक ड्राफ्ट तैयार किया और सूत्रों के अनुसार राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा, एनसीपी के शरद पवार, वंदना चव्हाण, प्रफुल्ल पटेल सहित कई नेताओं ने हस्ताक्षर कर दिए हैं.

तृणमूल कांग्रेस को भी इसमें साथ जोड़ने की कोशिश हुई है. माना जा रहा है कि तृणमूल की ओर से समर्थन का आश्वासन भी दिया गया है. लेकिन उनके हस्ताक्षर हुए या नहीं इसकी पुष्टि नहीं हुई. मंगलवार को ममता बनर्जी ने कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं से मुलाकात की थी. बताते हैं कि उसमें भी इस पर चर्चा हुई.

कथित ड्राफ्ट में जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ पांच आरोप लगाए गए हैं जिसमें प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट जैसे मुद्दे शामिल हैं. वैसे राजनीतिक रूप से भी कुछ मुद्दों को लेकर वह निशाने पर रहे हैं. राम मंदिर का मुद्दा भी उनके ही अधीन है और जस्टिस लोया का मामला उनकी ही पीठ सुन रही है. ये ऐसे मामले हैं जिसे लेकर विपक्ष का एक घटक काफी आक्रामक रहा है. जस्टिस दीपक मिश्रा अक्टूबर में रिटायर हो रहे हैं.

गौरतलब है कि महाभियोग प्रस्ताव के लिए लोकसभा में 100 और राज्यसभा में कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं. प्रस्ताव पारित होने के बाद पीठासीन अधिकारी की ओर से तीन जजों की समिति का गठन किया जाता है. इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और किसी एक कानूनविद को शामिल किया जाता है. समिति आरोपों की जांच करती है और आरोप साबित होने पर सदन में प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति ही न्यायाधीश को हटाते हैं.