जानें क्यों त्रिवेन्द्र सरकार लोकायुक्त बिल लाने से बच रही है

राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के त्रिवेन्द्र सरकार के संकल्प का दायरा आखिर कितना है? यह तो मौजूदा यही सरकार जानती है, लेकिन बजट सत्र के अनिश्चितकाल के लिए समाप्त होने के बाद अब सरकार की मंशा पूरी तरह से फिलहाल स्पष्ट हो गयी है कि वह राज्य के अन्दर लोकायुक्त कानून नहीं लाना चाहती है.

लोकायुक्त को लेकर सूबे में भाजपा व कांग्रेस पूर्व में आमने-सामने आकर भिड़ते रहे हैं. प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचन्द्र खण्डूड़ी ने अपने कार्यकाल में लोकायुक्त बिल को लागू करने के लिए काफी प्रयास किये थे. जनरल खण्डूड़ी जहां एक ओर राज्य में इस बिल को लाकर उसे लागू करने की तैयारियों में जुटे हुए थे, वहीं उनके पार्टी-परिवार के लोगों द्वारा ही खण्डूड़ी को सीएम की कुर्सी से उतारने का षडयंत्र पूरे शबाब पर चल रहा था.

बताया जाता है कि खण्डूड़ी का यह लोकायुक्त बिल किसी को भी पसंद नहीं था, क्योंकि यदि यह बिल राज्य में लागू हो जाता तो सरकार और अफसरों की जवाबदेही निश्चित हो जाती और यह कानून कई के लिए गले की फांस बन जाता. आखिरकार खण्डूड़ी को अपनों द्वारा ही दी गयी मार के चलते मुख्यमंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा था. बाद में डाॅ रमेश पोखरियाल निशंक ने राज्य की कमान संभाली, तो लोकायुक्त बिल मानो राज्य उत्तराखण्ड से गायब-सा ही हो गया.

लेकिन कांग्रेस ने इस लोकायुक्त बिल पर विपक्ष में रहकर अपनी राजनीति व सियासत खूब चमकाई. आज चूंकि राज्य में भाजपा की सरकार है और उसका नेतृत्व त्रिवेन्द्र सिंह रावत कर रहे हैं, उनकी सरकार के सम्पन्न हुए बजट सत्र में इसी लोकायुक्त बिल को लेकर बड़ा हंगामा हुआ और विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी ने भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए सरकार से बिल को लाने व प्रदेश में उसे लागू करने की मांग उठाई, लेकिन सरकार के कानों पर इस बिल को लेकर कोई जूं नहीं रेंगी. सवाल यह है कि भले ही सूबे के मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार को लेकर अपने जीरो टाॅलरेंस की नीति पर काम कर रहे हैं परन्तु वे राज्य में भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए ठोस नीति अथवा लोकायुक्त बिल लाने व उसे लागू करने के पक्षधर बिल्कुल भी नहीं हैं.

राज्य के गठन होने के बाद यहां पर भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी तेजी के साथ फैलीं कि राज्य का विकास भी उससे प्रभावित होता हुआ नजर आया. प्रदेश में न सिर्फ 56 घोटालों की गूंज वर्षों तक रही, वहीं दूसरी ओर इसके बाद भी कई बड़े घोटालों ने राज्य उत्तराखण्ड को शर्मसार करने का काम किया. इसीलिए उत्तराखण्ड में पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी के लोकायुक्त बिल जैसा कानून लागू होने की अति आवश्यकता है और यह काम त्रिवेन्द्र सरकार ही कर सकती है, लेकिन फिलहाल टीएसआर सरकार ने इस बिल को लाने से अपनी सरकार की ओर से किनारा कर लिया है.

अपने बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने लोकायुक्त बिल को कोई भी तरजीह नहीं दी और सदन में लगातार इस मुददे को लेकर चिल्ला रही कांग्रेस की मांग को अनसुना कर दिया. सवाल मौजूदा रावत सरकार पर यह उठ रहा है कि आखिर वह राज्य में लोकायुक्त कानून संबंधी बिल लाने व उसको लागू करने से क्यों बच रही है?