सुप्रीम कोर्ट ने निकाह हलाला और बहुविवाह पर केंद्र सरकार को जारी किया नोटिस

तीन तलाक को अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था. हालांकि, मुस्लिम महिला संगठनों का कहना था कि सिर्फ तीन तलाक पर रोक लगाना काफी नहीं है. तीन तलाक की प्रथा के खिलाफ लंबी मुहिम चलाने वाले संगठन ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ (बीएमएमए) की सह-संस्थापक जकिया सोमन ने कहा था कि, मामला सिर्फ तीन तलाक तक सीमित नहीं है और हमारी लड़ाई किसी को सजा दिलाने की नहीं है, बल्कि मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ दिलाने की है. निकाह हलाला, बहुविवाह, शादी की उम्र, बच्चों के सरंक्षण जैसे मुद्दों का अभी निदान नहीं हुआ है. इन मुद्दों का समाधान करके ही मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ सुनिश्चित हो सकेगा.’’

मुस्लिम महिलाओं के निकाह हलाला और बहुविवाह को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और विधि आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. कोर्ट ने कहा कि बहुपत्नी प्रथा और निकाह हलाला के संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई संविधान पीठ करेगी. गौरतलब है कि तीन तलाक पर सुनवाई समाप्त करते हुए पांच न्यायाधीशों वाली पीठ ने इन मुद्दों को खुला रखा था.

निकाह हलाला और बहुविवाह पर सुप्रीम कोर्ट में चार याचिकाएं दाखिल की गई हैं, जिस पर सुनवाई जारी है. प्रमुख मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा था कि, मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ दिलाने का मकसद तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक प्रस्तावित कानून में निकाह हलाला, बहुविवाह और बच्चों के संरक्षण जैसे मुद्दे को शामिल नहीं किया जाता.

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को निकाह हलाला और बहुविवाह के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई की. नफीसा खान सहित चार याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इन दोनों प्रथाओं पर रोक लगाने और इन्हें असंवैधानिक करार दिए जाने की मांग की थी. याचिका में नफीसा ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि आईपीसी की धाराएं सभी नागरिकों पर बराबरी से लागू होने चाहिए. उन्होंने कहा कि तीन तलाक आईपीसी की धारा 498ए के तहत क्रूरता माना जाता है. वहीं बहुविवाह को धारा 494 के तहत एक अपराध माना गया है. ऐसे में इन प्रथाओं पर रोक लगाई जानी चाहिए, क्योंकि कानून के तहत ये दोनों अपराध की श्रेणी में आते हैं.

वहीं दिल्ली भाजपा के नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका में कहा गया कि, बहुविवाह और निकाल हलाला अनुच्छे-14 विधि के समक्ष समानता, (15) धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक और (21) (जीवन जीने का अधिकार) तथा लोक व्यवस्था, नैतिकता एवं स्वास्थ्य के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों के लिए नुकसानदेह है. ऐसे में इन प्रथाओं पर रोक लगाना चाहिए.

निकाह हलाला मुस्लिम समाज की एक प्रथा है. इसमें यदि पति अपनी पत्नी को तलाक दे देता है और वो बाद में फिर से उससे शादी करना चाहे तो इसके लिए महिला को किसी अन्य पुरुष से शादी करनी होगी. इस दौरान अपने दूसरे निकाह से बने पति से शारीरिक संबंध बनाने होंगे. जब दूसरा पति उसे तलाक दे, तब जाकर वह पहले पति से फिर से निकाह कर सकती है.

मुस्लिम को कानून के तहत एक से ज्यादा शादी करने की छूट है. इसकी बदौलत मुस्लिम व्यक्ति चाहे तो एक से ज्यादा पत्नी रख सकता है.