फिल्म रिव्यु:‘हिचकी’ को देखने की एकमात्र वजह रानी की दमदार एक्टिंग

रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म 'हिचकी'

बॉक्स ऑफ़िस पर आ चुकी ही है सिद्धार्थ पी मल्होत्रा की फ़िल्म ‘हिचकी’. काफी लंबे अर्से से फ़िल्म के प्रोमोज़ दिख रहे थे. रानी भी कई शोज़ में प्रमोशन करती दिखी और एक लंबे इंतज़ार के बाद फ़िल्म थियेटर में भी लग गई.

कहानी है नैना माथुर( रानी मुखर्जी) की, जो अपनी मां (सुप्रिया पिलगांवकर) और भाई (हुसैन दलाल) के साथ रहती हैं. नैना को है टॉरेट सिंड्रोम की परेशानी, जिसको हम हिचकी कह देते हैं. नैना बनना चाहती हैं स्कूल टीचर पर अपनी समस्या की वजह से उनको नौकरी नहीं मिलती. काफी लंबे प्रयास के बाद उनको एक स्कूल से कॉल आता है और उनको मिलती है क्लास 9F, जिसमें पढ़ते हैं बस्ती के 14 शैतान बच्चे. नैना किस तरह बच्चों को पढ़ाती हैं, रिज़ल्ट जानने के लिए फ़िल्म देखिए.

फिल्म रियलिटी से ज़रा दूर लगती है. कहानी काफी प्रेडिक्टेबल भी है. स्क्रीनप्ले और एडिटिंग पर ज़्यादा काम किया जा सकता था. रानी और बच्चों के बीच का कनेक्शन भी बहुत ज़्यादा महसूस नहीं होता. कहानी में कुछ नयापन नहीं होने की वजह से आप भले ही रानी की समस्या से कनेक्ट हो जाए, कहानी से नहीं हो पाते. रानी के पढ़ाने का तरीका, बीच बीच में आते कुछ पंच लाइन्स अच्छे हैं.

ये फ़िल्म अमेरिकन मोटिवेशनल स्पीकर और टीचर ब्रैड कोहेन से इंस्पायर है जिन्हें टॉरेट सिंड्रोम की परेशानी थी और वो भी काफी परेशानियों को झेलने के बाद टीचर बने थे. ‘हिचकी’ फ़िल्म की ज़िम्मेदारी एक तरह से रानी के कंधों पर ही टिकी है. रानी की एक्टिंग में कमी निकालना मुश्किल है. टॉरेट सिंड्रोम की समस्या को उन्होंने बखूबी दिखाया है. रियल लाइफ कपल सचिन पिलगांवकर और सुप्रिया पिलगांवकर रानी मुखर्जी के माता-पिता के रोल में हैं और दोनों का काम बेहतरीन है. हुसैन दलाल ने भी भाई के रोल में अच्छा काम किया है. इसके अलावा नीरज काबी, कुणाल शिंदे का काम भी अच्छा है.

अगर आप रानी मुखर्जी के फैन हैं, तो इस फ़िल्म को देखिए क्योंकि ‘हिचकी’ को देखने की एकमात्र वजह रानी की दमदार एक्टिंग ही है.

फिल्म रिव्यु द्वारा: श्वेता तिवारी