अभी से जूट जाएं बूंद बूंद पानी बचाने की जद्दोजहद में

आज विश्व जल दिवस है. जल के महत्व को जानने का दिन. जल संरक्षण के संकल्प का दिन और समय रहते सचेत हो जाने का दिन. वर्षाजल को सहेजने के समेकित प्रयास विगत कुछ दशकों से सरकारी स्तर पर होते आए हैं. लेकिन अब जो प्रयास होते दिख रहे हैं, वे स्वत: किसानों द्वारा किए जा रहे हैं. यह एक अच्छा संकेत है.

किसानों को यह बात अच्छे से समझ में आ चुकी है कि जल, जंगल और जमीन के संतुलित विकास के बिना उपयुक्त पारिस्थिति का होना असंभव है. प्रस्तुत है ऐसे ही कुछ ठोस प्रयासों को बयां करती बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से सुरेश देवांगन और पौड़ी, उत्तराखंड से गुरुवेंद्र नेगी की यह रिपोर्ट.

प्रयास में जुटे सैकड़ों किसान कोरबा, छत्तीसगढ़ के चार गांवों के करीब 1100 किसानों ने ठान लिया है कि अबसूखे की मार नहीं झेलना है. इनकी मानें तो 320 हेक्टेयर बंजर भूमि में इस बार मानसून में फसल लहलाएगी. गांव के एक रिटायर्ड शिक्षक नंदलाल की मदद से उन्होंने युक्ति भी खोज निकाली.

गांवों के बीच में बड़ा पहाड़ मौजूद है. नाम है मड़वारानी पहाड़. गांव वालों का कहना है कि बारिश का लाखों क्यूसेक पानी इस पहाड़ से होता हुआ यूं ही बह जाता है. अब वे इसे सहेजने का जतन कर रहे हैं ताकि खेतों की प्यास बुझाई जा सके.

पहाड़ के चारों ओर पिरामिडीय कटाव बनाकर क्यारीनुमा नालियां बनाई जा रही हैं. पहाड़ से उतरने वाले वर्षाजल को इन नालियों से होते हुए खेतों तक पहुंचाया जाएगा. दो फुट चौड़े व तीन फुट गहरे नाले का निर्माण किया जा रहा है, जिसमें से छोटी-छोटी नालियों के जरिये पानी को खेतों तक पहुंचाया जाएगा. किसानों द्वारा अपने-अपने खेतों में भी क्यारियां बनाई जा रही हैं ताकि वर्षाजल को खेतों में भी सहेजा जा सके.