कांग्रेस ने मोदी सरकार पर राफेल सौदे में 12,362 करोड़ रुपये का लगाया आरोप

कांग्रेस ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ ‘समझौता’ करने तथा 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीद कर सरकारी खजाने को 12,362 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया. राफेल विमान की निर्माता कंपनी डसाल्ट एविएशन की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि इस कंपनी ने अपना एक विमान कतर एवं मिस्र को जिस दाम पर बेचा था, उसके 11 माह बाद भारत को उस दाम से 351 करोड़ रुपये अधिक पर बेचा.

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और रणदीप सुरजेवाला ने संसद भवन परिसर में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि भारत को 2016 में 36 राफेल विमान 7.5 अरब यूरो में बेचे गए. पार्टी ने दावा किया कि इसके अनुसार भारत को प्रत्येक विमान करीब 1670.70 करोड़ रुपये में बेचा गया, जबकि कतर एवं मिस्र को यही विमान 1319.80 करोड़ रुपये में बेचा गया. पार्टी नेताओं ने कहा कि प्रत्येक विमान के दाम में 351 करोड़ रुपये का अंतर था.

आजाद, सुरजेवाला और पूर्व केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने इस अवसर पर दावा किया कि राफेल विमानों की खरीद में सरकार ने पूरी तरह से अपारदर्शिता बरती है. आजाद ने दावा किया कि यदि मोदी सरकार ने यूपीए सरकार द्वारा 126 विमानों के लिए किये गये सौदे को रद्द न किया होता तो वह 41,212 करोड़ रुपये बचा सकती थी.

कांग्रेस नेताओं ने एक बयान में कहा, ‘राफेल सौदे पर मोदी सरकार की ध्यान भटकाने वाली युक्तियों के कारण इस बारे में जवाब मिलने के बजाय कई सवाल पैदा हुए हैं.’

प्रधानमंत्री पर राष्ट्रीय सुरक्षा एवं हितों के साथ समझौता करने का आरोप लगाते हुए आजाद ने कहा कि 126 विमानों के बजाय 36 विमान ही क्यों खरीदे गये, जबकि पूर्व में किए गए सौदे के लिए अंतरराष्ट्रीय बोलियां आमंत्रित की गई थीं. उन्होंने सवाल किया, ‘क्या यह राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता नहीं है? प्रधानमंत्री एवं रक्षा मंत्री खरीद मूल्य (राफेल विमान का) छिपा क्यों रहे हैं? क्या यह सही है कि 12 दिसंबर 2012 की बोली के अनुसार राफेल के प्रति विमान की कीमत 526.1 करोड़ रुपये थी जबकि मोदी सरकार ने प्रति विमान की खरीद 1670.70 करोड़ रुपये की कीमत पर की.’

सुरजेवाला ने कहा कि यह सौदा कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की समिति की पूर्व अनुमति के किया गया, जिसमें राष्ट्रीय हितों को ताक पर रखा गया. साथ ही 36 हजार करोड़ रुपये के ऑफसेट समझौते को हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लि. के बजाय एक ऐसी निजी कंपनी को दे दिया गया, जिसके पास रक्षा निर्माण का कोई अनुभव नहीं है.