भारत-फ्रांस एक-दूसरे के युद्धपोतों के लिए खोलेंगे नेवल बेस, रोकेंगे चीन का बढ़ता दबदबा

साउथ चाइना सी के साथ-साथ चीन हिंद महासागर में भी अपनी पकड़ मजबूत करने में लगा हुआ है. बड़े-बड़े देशों की इसपर नजर है और वे इससे चिंतित भी हैं. माना जा रहा है कि भारत और फ्रांस भी इस बात को समझ रहे हैं और इसलिए सैन्य सहयोग के लिए समझौते हुए हैं.

फ्रांस भारतीय हितों की सुरक्षा में मदद कर सकता हैं. फ्रांस का एक द्वीप है जिसका नाम रीयूनियन है, वह हिंद महासागर में है. यह द्वीप चीन की हरकतों पर नजर रखने के लिए काम आ सकता है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पहले ही कह चुके हैं कि उनके पास बड़ी समुद्री शक्ति है और भारत को वह मजबूत साझेदार के तौर पर देखते हैं. प्रशांत महासागर से जुड़े भारतीय हितों के लिए भी यह द्वीप खास भूमिका अदा कर सकता है.

हिंद महासागर में अपना दबदबा बढ़ाने में लगे चीन को ध्यान में रखकर भारत और फ्रांस ने एक महत्वपूर्ण सुरक्षा डील की है. इसके तहत शनिवार को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और पीएम मोदी के बीच सैन्य सहयोग के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए गए.

समझौते के अनुसार, दोनों देश अपने नेवल बेस को एक-दूसरे के युद्धपोतों के लिए खोलेंगे. चीन कई छोटे देशों को अपने साथ मिलाकर साउथ चाइना सी, हिंद महासागर में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. इसे देखते हुए यह समझौता अहम माना जा रहा है.

चीन ने पूर्व अफ्रीका के जिबूती में पिछले साल नेवल बेस खोला था. इससे पहले ही वह हिंद महासागर में स्वेज नहर से लेकर मलक्का तक अपने पांव पसार रहा है. चीन के वन बेल्ट-वन रोड प्रॉजेक्ट में भी कई ऐसे एशियाई और अफ्रीकी देश शामिल हैं, जो हिंद महासागर के आसपास हैं.

वन बेल्ट-वन रोड प्रॉजेक्ट के लिए चीन पाकिस्तान में एक बंदरगाह बना रहा है, श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह को वह 99 सालों के लिए लीज पर ले चुका है और मालदीव के कई छोटे द्वीपों को भी उसने खरीद लिया है.