हल्द्वानी : अन्ना ने कहा, मुझे एक दिन आत्महत्या का खयाल भी आया

सर्किट हाउस काठगोदाम में अन्ना ने कार्यकर्ताओं के बाद मीडिया से मुलाकात की. अन्ना ने कहा कि हमारा मकसद लोकतंत्र में सुधार करना है.

उन्होंने किसान हित, चुनाव सुधार तथा लोकपाल व लोकायुक्त की नियुक्ति पर यूपीए सरकार के साथ-साथ वर्तमान सरकार पर भी तमाम सवाल दागे.

समाजसेवी अन्ना हजारे 23 मार्च को दिल्ली में होने वाली सत्याग्रह रैली के लिए समर्थन जुटाने को आज हल्द्वानी पहुचे हैं.

अन्ना ने कहा 4 साल से केंद्र सरकार लोकपाल पर चुप बैठी थी, अभी 4 दिन पहले इसको लेकर बैठक की है. यह भी हमारे आंदोलन से डरकर हुई है. पहले कांग्रेस ने लोकपाल कानून पास तो कर दिया, लेकिन उसे कमजोर बनाया.

फिर उम्मीद थी मोदी सरकार 2014 में इसे मजबूती के साथ लागू करेगी, लेकिन वहां भी इसे और कमजोर कर दिया गया. इस मामले में कांग्रेस ग्रेजुएट तो भाजपा डॉक्टरेट डिग्री वाली पार्टी की तरह नजर आई.

22 साल में 12 लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली. कृषि प्रधान देश में किसानों की आत्महत्या सरकारों के लिए बड़ा मुद्दा ही नहीं रहा. प्रधानमंत्री मोदी किसानों की आय दोगुनी करने की घोषणा के बाद कह रहे हैं, नीति आयोग इसे लागू करेगा. यदि आयोग को ही इस पर अभी काम करना था तो घोषणा की जल्दीबाजी क्यों?

चुनाव सुधार पर अन्ना बोले, हम 2011 से राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट की मांग कर रहे हैं, मगर सरकार नोटा ले आई. नोटा से कुछ नहीं होने वाला. 23 मार्च को हमारा आंदोलन जनता का आंदोलन होगा और इस बार लड़ाई करो या मरो की होगी. इस आंदोलन में किसी भी राजनीतिक व्यक्ति या दल के लिए हमारे दरवाजे बंद रहेंगे.

पिछले आंदोलन से हमें सीख मिली है, इसलिए अब कोई दूसरा अरविंद पैदा नहीं होगा. चुनावी साल में आंदोलन के सवाल पर अन्ना बोले, मैं 4 साल से चुप नहीं था, बल्कि 30 से अधिक पत्र केंद्र सरकार को लिखे हैं.

सरकार ने नहीं सुनी तो अब सड़क पर आने का मन बनाया है. उत्तराखंड में पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी के लोकपाल कानून पर उन्होंने कहा कि यदि खंडूड़ी हमारे दिए गए इस ड्राफ्ट को गांव-गांव पहुंचा दिए होते तो दोबारा सत्ता में होते.

विपक्ष मुक्त सरकार के मसले पर कहा कि कोई भी कानून लोकसभा व राज्यसभा में चर्चा करने के बाद ही अमल में आना चाहिए. अन्यथा लोकतंत्र नहीं बल्कि हुकुम तंत्र बन जाएगा.

अन्ना हजारे ने कहा कि मैं किसी से वोट या मदद मांगने नहीं घूम रह. 25 साल की आयु से देश के लिए समर्पित होकर जुटा हूं. आज 80 साल का हो गया हूं. क्या लेकर यहां से जाऊंगा.

मुझे एक दिन आत्महत्या का खयाल भी आया. कई लोग खाने के लिए जी रहे हैं तो कई लोग क्या-क्या खाऊं सोच के साथ जी रहे हैं. मुझे विवेकानंद का दर्शन पढ़कर जनसेवा ही सच्चा मार्ग लगा.