खुश‍ियां अपार लाया उत्तरायणी का त्योहार, महापर्व मकरैणी की शुभकामनाएं

मकर सक्रांति या उत्तरायणी हिन्दुओं के सबसे पवित्र धार्मिक आयोजनों में से एक है. इस दिन श्रद्धालु बड़ी संख्या में पवित्र नदियों में डुबकी लगाते हैं और मान्यता है कि ऐसा करने से उनके समस्त पाप कट जाते हैं. मकर सक्रांति का पर्व लगभग पूरे देश में कई नामों से मनाया जाता है. लोहड़ी या तत्वाणी के अगले दिन यानी 14 जनवरी को यह त्योहार मनाया जाता है.

उत्तराखंड में मकर सक्रांति या उत्तरायण‍ी की रौनक देखने लायक होती है. इस दिन घरों में एक से बढ़कर एक पकवान बनते हैं और बच्चों की तो समझ‍िए मौज हो जाती है. हर तरफ रौनक और खुशी दिखती है. सुबह जल्दी उठकर ठंडे पानी से नहाना, धूप सेकना और लजीज पकवानों का लुत्फ लेकर मेला देखने जाना. प्रवासी उत्तराखंडी लोग जिन त्योहारों और धार्मिक आयोजनों को सबसे ज्यादा याद करते हैं उनमें से एक उत्तरायणी भी है.

हिन्‍दू कलेंडर के अनुसार सूर्य के कर्क राशि‍ से मकर राश‍ि में प्रवेश करने के उपलक्ष्‍य में मकर सक्रांति मनाई जाती है. इस दिन को ऋतु परिवर्तन के रूप में भी देखा जाता है. मकर सक्रांति के दिन से सूर्य धीरे-धीरे उत्‍तरायण होने लगते हैं यानी उत्तर दिशा की ओर बढ़ने लगते हैं. इसके बाद दिन बड़े और गर्म होने लगते हैं.

प्रवासी पक्षी भी जो पहाड़ों की ठंड से बचने के लिए मैदानी इलाकों की ओर गए थे, वापस आना शुरू हो जाते हैं. कुमाऊं क्षेत्र में इसे ‘उत्‍तरायणी’ और ‘घुघती सज्ञान’ के नाम से भी जाना जाता है, जबकि गढ़वाल में ‘खिचड़ी सक्रांति’ या ‘मक्राणी’ कहा जाता है. इस दिन समूचे उत्तराखंड में कई जगहों पर मेले लगते हैं. बागेश्वर और डाडामंडी के उत्तरायणी मेले अपनी खास पहचान रखते हैं.

काले कौवा काले, घुघती माला खा ले…

सभी के चेहरों में खुशी लेकर आती है घुघती सज्ञान
सभी के चेहरों पर खुशी लेकर आती है घुघती सज्ञान

उत्तरायणी को प्रवासी पक्ष‍ियों के वापस लौटने के रूप में भी देखा जाता है. कुमाऊं में इस दिन गेहूं के आटे से घुघुत, खजूर व अन्य चीजें बनाई जाती हैं, गढ़वाल में उत्तरायणी के दिन उड़द के दाल की ख‍िचड़ी खाने व ब्राह्मणों को दान देने का रिवाज है. कुमाऊं में इस दिन कौवे का आह्वान करके उसे घुघुत ख‍िलाया जाता है. कौवे का सिर्फ नाम लिया जाता है, असल में यह सर्दी के दिनों में प्रवास करके लौटे पक्ष‍ियों का स्वागत होता है. इसके लिए ‘काले कौवा काले, घुघती माला खाले’ गाकर चिड़‍ियों को बुलाया जाता है.

गेहूं के आटे में सौंफ, गुड़ व मेवा आदि मिलाकर अलग-अलग डिजाइन बनाए जाते हैं. कुछ देर धूप में सुखाने के बाद इन्हें घी में तल लिया जाता है और बन गए घुघुत. बच्‍चे घुघुत की माला बनाकर उसे गले में डाल लेते हैं और फिर पूरे गांव भर में घूमते-फिरते हैं.

गढ़वाल में भी मक्राणी या खिचड़ी सज्ञान के दिन एक से बढ़कर एक पकवान बनते हैं, लेकिन ख‍िचड़ी बेहद जरूरी है. गांवों में इसे चुन्निया त्योहार भी कहते हैं, इस दिन खास किस्‍म के आटे से मालपुवे (चुन्निया) बनाए जाते हैं.