आसमान में उड़ रही AAP को 2017 ने दिखायी जमीनी हकीकत, रफ्तार पर लगा ब्रेक

आम आदमी पार्टी (आप) के लिये साल 2017, संगठन में विस्तार के लिहाज से बहुत फलदायी साबित नहीं हुआ. तमाम उतार चढ़ावों के बावजूद महज पांच साल में दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना और एक अन्य राज्य पंजाब तथा दिल्ली के स्थानीय निकाय में मुख्य विपक्षी दल बन जाना इस अल्पवय राजनीतक पार्टी के लिये उपलब्धि से कम नहीं है.

साल 2015 में जिस हैरतअंगेज चुनाव परिणाम के साथ दिल्ली की सत्ता पर आप काबिज हुयी, उसे देखकर तो यही लगा कि चुटकी बजाते ही सब कुछ बदल देने की धुन में रमे नौजवानों की यह टोली समूचे देश में बड़े राजनीतिक बदलाव का वाहक बनेगी. लेकिन इस साल के शुरू में हुये दिल्ली नगर निगम चुनाव और फिर पंजाब तथा गोवा के विधानसभा चुनाव में आप को उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिलना, पार्टी की पूर्व नियोजित ‘मिशन विस्तार’ योजना के लिये ‘स्पीड ब्रेकर’ साबित हुआ.

आप के अपने आधार स्तंभ नेताओं का भी इस साल पार्टी से मोहभंग हुआ. प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव और प्रो. आनंद कुमार को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा, असीम अहमद, जितेन्द्र तोमर और अब कुमार विश्वास सरीखे नेताओं के पार्टी में रहकर ही उभर रहे बगावती असंतोष को नजरंदाज नहीं किया जा सकता.

पंजाब और गोवा की जनता से वादों और दावों के जाल में नहीं फंसने का दो टूक जवाब मिलने के बाद साल 2017 से आप मुखिया अरविंद केजरीवाल सहित पार्टी के अन्य नेताओं ने ‘जुबां काबू’ में रखने की नसीहत ली. जीवन के पहले दो चुनाव लड़कर दोनों बार मुख्यमंत्री बनने और अपनी पार्टी को सत्तासीन करने का रिकॉर्ड बनाने वाले आप संयोजक अरविंद केजरीवाल के लिये भविष्य में पार्टी का स्ट्राइकिंग रेट बरकरार रख पाने की चुनौती गुजरते समय के साथ गंभीर होती जा रही है. गुजरात विधानसभा चुनाव में आप को मिली करारी शिकस्त और कांग्रेस के उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन का असर दिल्ली सहित अन्य राज्यों में पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ना तय है.

लाभ के पद के मामले में फंसे आप के 21 विधायकों की विधानसभा सदस्यता पर चुनाव आयोग में लटकी तलवार पार्टी के लिये इस साल की दूसरी बड़ी परेशानी बनी. इसका फैसला अगले साल के शुरू में ही आने की उम्मीद है. अगले साल आठ राज्यों में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को देखते हुये आप ने राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक पर नजर गड़ायी है. इन राज्यों में आप अपना संगठन मजबूत करने में लगी है. जबकि पंजाब में बने जनाधार को दरकने से बचाने के लिये केजरीवाल ने दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को राज्य इकाई का प्रभारी बनाकर नुकसान रोकने की कवायद की है.

वहीं पार्टी की दिल्ली इकाई के प्रभारी गोपाल राय छत्तीसगढ़ में, रत्नेश गुप्ता मध्य प्रदेश में, केजरीवाल के पूर्व राजनीतिक सलाहकार आशीष तलवार कर्नाटक में और फिलहाल नाराज चल रहे कुमार विश्वास राजस्थान में आप के लिये चुनावी जमीन तैयार करने में जुटे हैं. केजरीवाल खुद 2019 के लोकसभा चुनाव की कमान संभाल रहे हैं.

साल 2018 के लिये केजरीवाल की पहली आसन्न चुनौती राज्यसभा की दिल्ली की तीन सीटों के लिये माकूल चेहरों का चुनाव करना है. इसके लिये मंथन के दौर से गुजर रहे आप नेतृत्व पर सभी की नजरें टिकी हैं कि पार्टी किन चेहरों को संसद के उच्च सदन में दिल्ली के प्रतिनिधित्त्व के लिये चुनती है.