उत्तराखंड के 33, देशभर में 2217 गांव अब भी अंधेरे में, न जाने कब पहुंचेगी बिजली

उत्तराखंड में 33 गांव अब भी ऐसे हैं जहां बिजली नहीं पहुंच पायी है. ये गांव अब भी आदम युग में ही जी रहे हैं. अंधेरा होते ही लोगों का संसार अपने घरों के अंदर तक ही सिमट जाता है. दीये की रोशनी में रात के सारे काम होते हैं. उत्तराखंड ही नहीं देशभर में 2217 गांव अब भी अंधेरे में जीवन यापन कर रहे हैं.

बिजली मंत्रालय देश में बिना बिजली वाले सभी गांवों में इस साल दिसंबर तक बिजली पहुंचाने के अपने आंतरिक लक्ष्य को पूरा करने में नाकाम रहा है. अब भी दूर दराज के लगभग 2,217 गांव ऐसे हैं जहां अभी बिजली नहीं पहुंचायी जा सकी है.

हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2015 को राष्ट्र को संबोधित करते हुए बिजली से वंचित सभी गांवों को 1000 दिनों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा था, जो मई 2018 में पूरा होगा. लेकिन मंत्रालय ने खुद ब खुद इस काम को उससे पहले पूरा करने का बीड़ा उठाया था. वैसे अगर इस साल को देखा जाए तो जनवरी से नवंबर तक 3,652 गांवों में बिजली पहुंचाई गई है.

अधिकारियों के अनुसार, वास्तव जो भी गांव बचे हैं उनकी भौगोलिक स्थिति काफी कठिन है. पूर्वोत्तर के कुछ गांव ऐसे हैं जहां पहुंचने में दो दिन से भी अधिक समय लगता है. ऐसे में इन गांवों तक बिजली पहुंचाने के काम में समय लग रहा है. मंत्रालय के अनुसार कुल 2,217 गांवों में से अरुणाचल प्रदेश में सर्वाधिक 1,069 गांव है, जहां बिजली पहुंचायी जानी है. इसके अलावा असम (214), बिहार (111), छत्तीसगढ़ (176), जम्मू कश्मीर (99), झारखंड (176), मध्य प्रदेश (34), मणिपुर (54), मेघालय (50), मिजोरम (11), ओडिशा (182), उत्तराखंड (33) तथा कर्नाटक (8) में कुछ गांव बचे हैं जहां अभी बिजली पहुंचाई जानी है.

बिजली मंत्री आरके सिंह ने पिछले दिनों एक बातचीत में कहा था, ‘हम अप्रैल 2018 तक सभी गांवों को बिजली पहुंचाने का काम निश्चित रूप से पूरा लेंगे.’

विद्युत मंत्रालय ने सभी घरों को बिजली पहुंचाने के साथ मार्च 2019 से सातों दिन 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराने का महत्वकांक्षी लक्ष्य रखा है. इसके तहत एकीकृत ऊर्जा विकास योजना (आईपीडीएस) चलायी जा रही है, जिसका मकसद शहरी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण और भरोसेमंद 24X7 निर्बाध बिजली आपूर्ति प्रदान करना है. अब तक, 3,616 शहरों के लिए कुल 26,910 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी प्रदान की गई है. राज्यों से संबंधित संस्थाओं को 23,448 करोड़ रुपये मूल्य का कार्य दिया गया है.

चालू वर्ष के दौरान बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति में सुधार तथा उसे पटरी पर लाने की उदय (उज्ज्वल डिस्काम एश्योरेंस स्कीम) एवं पारेषण व्यवस्था को मजबूत करने पर भी जोर बना रहा. नागालैंड, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह, दादर नागर हवेली और दमन एवं दीव के नवंबर 2017 में उदय योजना से जुड़ने के साथ अबतक कुल 27 राज्य और चार केंद्र शासित प्रदेश इससे जुड़ गए हैं.

उदय के अंतर्गत प्रतिभागी राज्यों के कार्य-प्रदर्शन की गहन निगरानी सुनिश्चित करने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी निगरानी समिति कार्यप्रणाली स्‍थापित की गई है.

देशभर में बिजली की कुल स्थापित क्षमता नवंबर तक 3,31,118 मेगावाट पहुंच गयी है जो दिसंबर 2016 में 3,10,005 मेगावाट थी. इसी तरह इस वर्ष अक्टूबर के अंत तक बिजली उत्पादन 714 अरब यूनिट रहा जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले लगभग 4.33 प्रतिशत अधिक है. पराली या खेतों में फसलों की बची डंठल जलाने के कारण होने वाले प्रदूषण को लेकर जारी चिंता के बीच बिजली मंत्रालय बिजली उत्पादन ने बिजली बनाने में बायोमास के उपयोग की नीति जारी की.

इन सबके अलावा मंत्रालय पनबिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दे रहा है और जल्दी ही इस संदर्भ में नीति लाने की तैयारी में है. इस क्षेत्र में कुल 1305 मेगावाट की 11 परियोजनाएं 2017-18 में चालू होने की संभावना है. इसमें से 465 मेगावाट क्षमता की सात परियोजनाएं पहले ही चालू हो चुकी हैं.

मंत्रालय अक्षय ऊर्जा के साथ उपकरणों पर लगने वाले स्टार रेटिंग कार्यक्रम, एलईडी बल्ब वितरण जैसे ऊर्जा संरक्षण उपायों, इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद जैसे कार्यक्रमों को लेकर भी पूरे साल चर्चा में रहा.

इसके अलावा इस साल मंत्रिमंडल फेरबदल में बिजली तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी पीयूष गोयल की जगह आरके सिंह को दी गई. गोयल को रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई.