क्या आप जानते है एशिया का पहला चर्च नैनीताल में है, जानिए कई रोचक बातें….

साभार नैनीताल टूरिज्म

विश्व के प्रसिद्ध पर्यटन नगरीयों में से नैनीताल ऐतिहासिक रूप से भी बहुत प्रशिद्ध है. यहां मौजूद ब्रिटिश ऐतिहासिक विरासत तथा चर्च इसे और भी खूबसूरत और एतिहासिक बनाते है. माल रोड में इस्थित मैथोडिस्ट चर्च कई मायनों में खास है. इस चर्च को एशिया का पहला मैथोडिस्ट चर्च के रूप में स्थापित होने का गौरव प्राप्त है. सरोवर की नगरी की बात करे सेंट जोंस, सेंट फ्रांसिस कैथोलिक चर्च, सेंट निकोलस आदि खुबसूरत चर्च हैं.

अमेरिकी मैथोडिस्ट मिशनरी के विलियम बटलर 10 मई 1885 को भारत पहुंचे. इस दौरान उन्होंने इलाहाबाद, दिल्ली तथा इससे लगे शहरों में मैथोडिस्ट धर्म का प्रचार प्रसार किया. जिसके बाद वह बरेली में रहने लगे. 1858 के गदर के दौरान सभी जगह आंदोलन के चलते बरेली के कमांडर निकलसन ने श्री बटलर को सुरक्षा की दृष्टि से नैनीताल जाने की सलाह दी.

उन्होंने कहा की खाली कुमाऊं को छोड़ कुमाऊं व गढ़वाल गदर से सुरक्षित हैं. 22 सितंबर 1859 को विलियम बटलर नैनीताल पहुंचे. मैथोडिस्ट के प्रचार प्रसार के दौरान वटलर ने तत्कालीन कमिश्नर सर हैनरी रैमजे के सहयोग से 1859 में मल्लीताल रिक्शा स्टैंड के समीप चर्च की स्थापना की नीव रखी, जो 1870 में तैयार हुआ. उसी वर्ष से इसमें क्रिसमस के कार्यक्रमों की शुरुआत हुई.

ब्रिटिशर्स की ओर इस चर्च को रोशनी को महत्व देते हुए सामान्य ग्रामीण परिवेश के अनुरूप तैयार किया गया है. सादगी का प्रतीक यह चर्च क्षेत्र के भौगोलिक परिवेश के अनुरूप तैयार किया गया, इसे काउंटी चर्च भी कहा जाता है. पहले 16वीं सदी से पूर्व तक 6 दिसंबर को क्रिसमस पर्व मनाया जाता था.

14वीं व 15वीं शताब्दी के धार्मिक आंदोलनों में सेंट निकोलस को काफी महत्व दिया गया. यूरोपियन्स के अमेरिका जाने के बाद 16वीं शताब्दी में सेट निकोलस को ही सेंटा क्लाज की संज्ञा दी गई. जिसके बाद से 25 दिसंबर को क्रिसमस पर्व मनाया जाने लगा.

(साभार- लाइवहिंदुस्तान)