जल्द हो सकते हैं सहारनपुर-बिजनोर उत्तराखंड में व मुजफ्फरनगर-शामली हरियाणा में शामिल

फाइल चित्र

आप माने या न माने लेकिन यह सच है कि उत्तराखण्ड को डबल इंजन की सरकार देने की चुनावी बात करने वाली भाजपा अब उत्तराखण्ड का पर्वतीय स्वरूप ही बदलने जा रही है. यदि मोदी सरकार के साथ साथ योगी सरकार और त्रिवेन्द्र सरकार की मंशा कारगर हो गई तो उत्तराखण्ड मे उत्तर प्रदेश के दो बड़े जिले सहारनपुर व बिजनोर मिलाये जायेगे जबकि उत्तर प्रदेश के ही मुजफ्फरनगर और शामली को हरियाणा मे मिलाकर मेरठ को एनसीआर मे शामिल करके एक तरफ हरित प्रदेश की मांग का गला घोटने और दूसरी तरफ उत्तराखण्ड के मूल पर्वतीय स्वरूप को पलिता लगाने की कार्य योजना को फलित किया जायेगा.

इस कार्य योजना पर मिली जानकारी के अनुसार केंद्र व सम्बंधित राज्य सरकारो के बीच विचार विमर्श का काम भी शुरू हो चुका है. इसके पीछे मोदी सरकार का मकसद है कि उत्तराखण्ड मे पहाड़ व मैदान के लोगो का संख्या बल एक हो ताकि किसी एक क्षेत्र की मनमानी पर रोक लग सके साथ ही चूंकि आर्थिक संसाधन पर्वतीय जिलो के पास नही है इस कारण आर्थिक रूप से सम्पन्न मैदानी जिलो को शामिल कर उत्तराखण्ड को आर्थिक स्वावलम्बी बनाया जाये. भाजपा की इसके पीछे यह सोच भी कही जा सकती है कि मैदानी जिलो चाहे हरिद्वार हो या फिर सहारनपुर और बिजनोर भाजपा का प्रदर्शन बेहतर रहा है. जो उसके लिए भविष्य के लिए फायदे का सौदा सिद्ध हो सकता है.

ऐसा होने से निश्चित रूप से सहारनपुर और बिजनोर के लोगो को तो लाभ होगा क्योकि वे उत्तर प्रदेश से बहुत छोटे राज्य उत्तराखण्ड जो अभी तक विकास की दृष्टि से उत्तर प्रदेश से कही आगे रहा है,का हिस्सा बन जायेगे. हरिद्वार को भी मैदानी संख्या बल बढ़ने से यहा के सरोकारों मे इजाफा होने की उम्मीद बढ़ेगी, लेकिन उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना जिस पर्वतीय मूल क्षेत्र को संरक्ष ण देने के लिए की गई थी और जिसके लिए पर्वतीय मूल की माँ बहनो ने बड़े बड़े अत्याचार सहे और शहादत देकर यह उत्तराखण्ड प्राप्त किया उस मूल अवधारणा को ग्रहण जरूर लग जायेगा. जो पर्वतीय मूल के लोगो की भावनाओ के साथ एक धोखे की तरह होगा.

वही इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे कई दशको से चल रही हाई कोर्ट की बैंच बनाने की मांग स्वतः ध्वस्त हो जायेगी व हरित प्रदेश का मुद्दा भी खुद ही दम तोड़ देगा, हालांकि चाहे बिजनोर हो या सहारनपुर दोनो ही लम्बे समय से खुद को उत्तराखण्ड मे शामिल करने की मांग उठाते रहे है.इसके पीछे हालांकि तिवारी और हरीश रावत शासन काल मे उत्तर प्रदेश से कही अधिक हुई प्रगति है जिसमे फिलहाल त्रिवेन्द्र सरकार की शिथिलता के चलते ठहराव सा आ गया है. जिसे दबे स्वर मे भाजपाई भी स्वीकारने लगे है. बहरहाल उत्तर प्रदेश के सहारनपुर व बिजनोर को उत्तराखण्ड व मुजफ्फरनगर तथा शामली को हरियाणा और मेरठ को एन सी आर मे मिलाने के लिए लखनऊ मे सचिव स्तरीय कई दौर की बातचीत शुरू हो चुकी है. जिसके जल्द ही फलित होने के आसार भी है.

यह परिणीति कब और कैसे कारगर होगी यह तो कहा नही जा सकता लेकिन आने वाली आहट बता रही है कि उत्तराखण्ड मे भाजपा दो मैदानी जिलो की घुसपैठ कराकर अपनी राननितिक रोटी सेकने की कोशिश मे जुट गई है. अब चाहे किसी को फायदा हो या घाटा. भाजपा को तो अपने राजनीतिक फायदे से मतलब. फिर चाहे उत्तराखण्ड का स्वरूप बने या बिगड़े. उत्तराखण्ड की जनता की भावनाये आहत हो या न हो.