उत्तराखंड सरकार ने पहाड़ों से पलायन रोकने के लिए विशेषज्ञों की कमेटी बनाई

पहाड़ शब्द ही अपने अर्थ में बहुत कुछ समेटे हुए है. पहाड़ मतलब कठिन, बहुत मुश्किल तो कैसे हम उम्मीद कर सकते हैं कि पहाड़ की जिन्दगी आसान होगी. ये मुश्किलें तब और बढ़ जाती हैं जब संसाधन कम हो जाते हैं. उत्तराखंड और कई पहाड़ी राज्य पलायन की मुख्य समस्या से ग्रसित हैं, लेकिन यह एक यक्ष प्रश्न है कि इस समस्या से निबटने के लिए प्रयास कितने हो रहे हैं.

पहाड़ों से होने वाले पलायन को रोकने के लिए अब त्रिवेन्द्र रावत सरकार कई कदम उठा रही है. अब सरकार की तरफ से वहां के मसालों और पहाड़ों में उगने वाली जड़ी बूटियों पर ध्यान केन्द्रित करने जा रही है. इसके लिए सरकार की तरफ से तीन कमेतियां भी गठित कर दी गई हैं. सरकार ने अब नौजवानों की मदद के लिए फल पौधशाला कानून और नियमावली बनाने की तैयारी कर रही है.

विदित है कि उत्तराखंड में पहाड़ी इलाकों से होने वाला पलायन हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है. त्रिवेन्द्र रावत सरकार ने अब ऐसे नौजवानों की मदद के लिए फल पौधशाला कानून और नियमावली बनाने की तैयारी कर रही है. इसके लिए लिए विशेषज्ञों की अलग अलग कमेटियां भी बना दी गई हैं. इस समिति को 15 दिन के भीतर रिपोर्ट देनी होगी.

उद्यान निदेशक डा. बीएस नेगी इसके अध्यक्ष बनाए गए हैं. इसके अलावा फल सब्जी और जड़ी बूटी के विशेषज्ञ नृपेंद्र चौहान, डॉ. बीपी नौटियाल, डा. एसके सिंह, डा. डीसी डिमरी, डा. आरके सिंह और डा. बीपी भट्ट को समिति सदस्य बनाया है.

सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि हमारी सरकार पलायन को रोकने के लिए एक कमेटी का गठन कर रही है और इसके द्वारा पलायन को रोका जाएगा. उन्होंने बताया कि इसकी निगरानी वह खुद करेंगे. इसके साथ ही ये भी कहा कि ये कमेटी गांव गांव जाकर पलायन पर रोक लगाने और युवाओं को रोजगार से रोडने के लिए काम करेगी. इस वक्त उत्तराखंड में पलायन एक गंभीर समस्या बन गया है. इससे पहले पहाड़ों में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए भी सीएम त्रिवेंद्र बड़ी पहल कर चुके हैं.

सीएम ने इससे पहले आदेश दे दिए थे कि सभी गांवों में रोजगार बढ़ाने के लिए नई नीति के तहत काम शुरू किया जाए. यहां बता दें कि राज्य में जड़ी बूटी, कृषि और चाय के विकास के लिए अपर सचिव उद्यान की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई है.

इस समिति में उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण चौबटिया, जड़ी बूटी शोध एवं विकास संस्थान गोपेश्वर, चाय विकास बोर्ड के निदेशकों के साथ ही भेषज इकाई के सीईओ, सगंध पौधा केंद्र सेलाकुई के वैज्ञानिक प्रभारी और सचिव राजस्व की ओर से नामित प्रतिनिधि सदस्य होंगे. ऐसा होने से पलायन को रोकने और निवेशकों को राज्य में आकर्षित करने में मदद मिलेगी.

तकरीबन चार साल पहले कराए गए एक सर्वे के अनुसार हर दिन 64 लोग पहाड़ों को छोड़कर शहरों की तरफ बढ़ रहे हैं. कई सौ गांवों में ताले लगे हुए हैं, हजारों मकान खंडहरों में तब्दील हो रहे हैं. उत्तराखंड का बोझ पहाड़ों से हटकर देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी, नैनीताल, काशीपुर, रुद्रपुर जैसी जगहों पर बढ़ रहा है. 9 नबम्बर 2000 को उत्तराखंड बना और सारे मुद्दों को पीछे करते हुए पलायन ने अपनी पकड़ और जकड़ दोनों ही अच्छी खासी बना ली.

इस राज्य की इस त्रासदी से न उभरने के लिए सरकारें दोषी हैं. पहाड़ों में अकूत सम्भवनाएं हैं. पर्यटन, औषधि, फल फूल ये ऐसे क्षेत्र हैं जो इन पहाड़ों को फिर से आबाद कर सकते हैं. बस जरूरत है तो चिह्नित करने की और उस दिशा में काम करने की.

पहाड़ी नौजवानों को शहरों में दिहाड़ी मजदूरी करते देखना अपने आप में एक दयनीय अनुभव हैं. खुली आबोहवा और स्वच्छ जल पीने का आदी वो नौजवान घुट घुट कर जीने को मजबूर है. क्योंकि उसे अपने पहाड़ों में रोजगार की कोई सम्भावना नहीं दिखती.

जरुरत हैं सरकार को गांव स्तर पर काम करने की. एक एक गांव को उसकी विशेषता के लिए चुना जाए और उस पर काम किया जाए. जो गांव नीचे में बसे हैं, उनकी लिए अलग नीति हो और जो गावं उपराऊ जमीन पर हैं, उनके लिए अलग नीति हो. खैर अब देखना है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र का ये ऐलान उत्तराखंड से किस तरह से पलायन को रोकता है.