‘हिमालय मानव सभ्यता का केंद्र है, यहां से सनातन धर्म एवं संस्कृति की धारा सदियों से प्रवाहित है’

उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. कृष्णकांत पाल ने बुधवार को सतत विकास के लिए विकास और पर्यावरण मे संतुलन स्थापित करने पर जोर देते हुए ऐसी नीति अपनाने को कहा, जिससे हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में रहने वालों की आवश्यकताएं पूरी होने के साथ ही पर्यावरण की सुरक्षा भी हो.

दून विश्वविद्यालय में ‘हिमालयी क्षेत्रों में सतत विकास की चुनौतियां’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में राज्यपाल ने कहा, ‘हमें ऐसी नीति अपनानी होगी, जिससे हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आधारभूत आवश्यकताएं भी पूरी हों और पर्यावरण व जैवविविधता का संरक्षण भी सुनिश्चित हो.’

हिमालय को केवल एक भू-स्थलाकृति ही नहीं बल्कि मानव सभ्यता का महत्वपूर्ण केंद्र बताते हुए राज्यपाल ने कहा कि यहां से हमारी सनातन धर्म एवं संस्कृति की धारा सदियों से प्रवाहित होती रही है और हिमालय का अध्ययन केवल एक भौगोलिक इकाई के वैज्ञानिक विश्लेषण तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता है. उन्होंने कहा, ‘हिमालय वस्तुतः समृद्ध भारतीय संस्कृति की आत्मा है.’

उत्तराखंड में भी ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव पड़ने के कारण यहां हर साल बादल फटने, भूस्खलन जैसी दैवीय आपदाओं की घटनाओं का जिक्र करते हुए राज्यपाल ने कहा कि अगर हमें हिमालय, यहां के वनों, नदियों, जीव जंतुओं, जैवविविधता की रक्षा करनी है तो स्थानीय लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करनी होगी.

राज्यपाल ने आशा व्यक्त की है कि इस तीन दिवसीय सेमीनार में वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों के गम्भीर मंथन से कुछ ठोस निष्कर्ष अवश्य निकलेंगे जो नीति निर्धारण में सहायक होंगे. केंद्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टम्टा ने कहा कि ऐसी तकनीक के विकास पर ध्यान देना चाहिए जिससे दैवीय आपदाओं का कुछ समय पहले पूर्वानुमान लगाया जा सके.

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण एवं स्थानीय लोगों की विकास की आवश्यकता को पूरा करने के लिए गम्भीर है और उच्च हिमालयी अध्ययन केंद्र खोलने की आवश्यकता महसूस करते हुए जी बी पंत हिमालयी पर्यावरण एवं विकास संस्थान को जी बी पंत हिमालयी पर्यावरण एवं स्थायी विकास के राष्ट्रीय संस्थान के रूप में दर्जा बढ़ा दिया गया है.