कन्या भ्रूण हत्या कानून से नहीं बल्कि समाज का नजरिया बदलने से थमेगी

रुद्रपुर, होली चाइल्ड स्कूल में हुए वार्षिकोत्सव ‘स्पंदन. द बीट्स’ के मौके बच्चों द्वारा प्रस्तुत बेटी की पुकार नृत्य नाटिका प्रस्तुत कर मौजूद लोगों के मन को झकझोर दिया. उन्होंने दिखाया कि कन्या भ्रूण हत्या कानून से नहीं बल्कि समाज का नजरिया बदलने से थमेगी. बताया कि कानून भले ही कितना भी कड़ा क्यों न हो. समाज बेटे और बेटी को एक नजर से नहीं देखेगा. दोनों को बराबर स्नेह सम्मान और अवसर नहीं देगा, तब तक लड़कियों का गर्भ में यूं ही कत्ल होता रहेगा.

बच्चों ने नाटक के जरिए बताया कि जहां जैन एवं वैदिक शास्त्रों में सौभाग्यवती पतिव्रता नारी तथा कुमारी कन्याओं को महान पवित्रता तथा व्यवहारिक मंगल का प्रतीक माना गया है, वहीं वैदिक पुराणों में भी नारी को देवी के रूप में स्वीकार किया गया है. मनुस्मृति में तो यहां तक कह दिया है कि, एक आचार्य दस अध्यापकों से श्रेष्ठ हैं, एक पिता सौ आचार्यों से श्रेष्ठ है और एक माता एक हजार पिताओं से श्रेष्ठ है.

इतनी सारी विशेषताओं से समन्वित एक समाज अब अपनी स्वाभाविक ममता का गला घोंटकर गर्भपात जैसे क्रूर कर्म की ओर आगे बढ़ता है तब उसे वर्तमान युग में क्या संज्ञा प्रदान की जाए, इसके बारे में आप स्वयं चिंतन करें. आज विश्व में 10 से 15 प्रतिशत विवाहित जोड़े सन्तानहीन हैं. विभिन्न सर्वेक्षणों से यह ज्ञात हुआ है कि सन्तानहीनता की यह व्याधि दिनों दिन तेजी से बढ़ रही है तथा दूसरी ओर गर्भपात का प्रचलन भी तेजी से बढ़ रहा है जो हमारे लिए लिए सबसे अधिक विचारणीय विषय बन गया है.

जैसे जैसे विज्ञान प्रगति कर रहा है, मानव के विचार व व्यवहार पतन की ओर अग्रसर हो रहे हैं. मानव मानव का भक्षक वैसे बन सकता है यह तथ्य गर्भपात करवाने की इच्छा से ही स्पष्ट हो जाता है. उन्होंने कहा कि आज बेटी बेटों से कम नहीं हैं. जहां वह घर की देखभाल करती हैं, वहीं देश की रक्षा के लिए भी शरहद पर तैनात है. हमें आज अपनी सोच बदलनी होगी, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब शादियों के लिए लड़कियां नहीं बचेंगी.