पहाडों से पलायन रोकने के लिए स्थानीय शिल्प को मिलेगा बढ़ावा

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मंगलवार को कहा कि पहाडों से पलायन रोकने के लिए स्थानीय शिल्प को बढावा देकर और उनके लिए बाजार ढूंढकर वहां के आर्थिक तंत्र को मजबूत किया जाएगा.

भारत-नेपाल सीमा के पास जौलजीबी में ऊन महोत्सव का उद्घाटन करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, ‘सरकार स्थानीय किसानों की उपज को बढ़ावा देगी. हम उच्च हिमालयी क्षेत्र के गांवों से हो रहे पलानय को रोकने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इन क्षेत्रों के स्थानीय शिल्पों को बढ़ावा देकर वहां की आर्थिकी को मजबूत कर ऐसा किया जा सकता है.’

इस मेले को भारत, नेपाल और चीन के बीच सद्भावना का एक संकेत बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि मेले में दक्षिण एशिया के पड़ोसियों के बीच ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं का आदान प्रदान होगा और उनके बीच सहयोग बढ़ेगा.

त्रिराष्ट्रीय मेले के रूप में मशहूर इस पारंपरिक जौलजीबी मेले में भारत, नेपाल और तिब्बत में निर्मित सामानों को प्रदर्शित किया जाता है और बेचा जाता है.

धारचूला के उपजिलाधिकारी आरके पांडे ने बताया, ‘इस साल सरकारी विभागों के 40 स्टाल इस मेले में लगाए गए हैं, जो पिछले साल के मुकाबले दोगुने हैं. हमने इस बार मेले में अपने उत्पाद प्रदर्शन करने के लिए उत्तराखंड के सिडकुल अधिकारियों के अलावा हिमाचल प्रदेश के विभागों को भी बुलाया है.’

पिछले 100 सालों से आयोजित किए जा रहे इस मेले के बारे में जिलाधिकारी सी रविशंकर ने कहा, ‘हम आदिवासी व्यापारियों को तरजीह दे रहे हैं जो यहां अपने हस्तशिल्प बेचने आए हैं.’ हालांकि, मेले में आए व्यापारियों का कहना है कि बदलती जीवनशैली में ग्राहक आजकल स्थानीय शिल्पकारों द्वारा बनाए गए सामान की अपेक्षा फैक्ट्रियों में बने सामानों को खरीदने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं.

मेले में आए दारमा घाटी के एक व्यापारी ने कहा, ‘खरीददारों की फैक्ट्री निर्मित सामानों के प्रति बढ़ती रुचि की प्रवृति ने न केवल गरीब आदिवासी व्यापारियों और शिल्पकारों से उनकी रोजी-रोटी का जरिया छीन लिया है, बल्कि मेले के महत्व को भी कम कर दिया है.’ कुछ वर्षों पहले तक जौलजीबी मेला आदिवासी परिवारों द्वारा बनाए गए स्थानीय शिल्प के लिए मुख्य हाट माना जाता था.

भारत और चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध से पहले तिब्बती व्यापारी स्थानीय ग्राहकों को अपने ऊनी उत्पाद बेचने के लिए मेले में आते थे. हालांकि, अब लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत-तिब्बत के बीच पांच महीने तक चलने वाले व्यापार के दौरान खुद भारतीय व्यापारी उन्हें खरीद लेते हैं और मेले में उन्हें बेच देते हैं.