18 साल का हुआ उत्तराखंड, ये हैं वो बातें जिन्होंने देवभूमि को पीछे धकेला

सुनील नेगी। अलग उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के 17 सालों के बाद भी आज इस हिमालयी प्रदेश में पलायन और गैर कानूनी खनन का सिलसिला जारी है. हालांकि सरकारी दावे इन्हें नकारने से अब भी बाज नहीं आते। पिछले 17 सालों की सुस्त रफ्तार विकास को देखते हुए यही लगता है कि पूरी दुनिया में देवभूमि के नाम से प्रख्यात उत्तराखंड राज्य जिन अवधारणाओं को लेकर बना था, हम अभी तक उन्हें पूरा करने की दिशा में रत्ती भर भी आगे नहीं बढ़ पाए हैं.

पिछले 17 साल में भाजपा और कांग्रेस ने उत्तराखंड में बारी-बारी से राज किया है। आज उत्तराखंड में ऐतिहासिक बहुमत वाली सरकार है, लेकिन यह कितना हैरतंगेज तथ्य है कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यानि साल 2000 से आज तक, 32 लाख से ज्यादा लोग उत्तराखंड के गावों से शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं और ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है.

राज्य के अस्तित्व में आने से पहले ये पलायन की गति अपेक्षाकृत बेहद धीमी थी, लेकिन उसे रोकने के लिए ही पृथक उत्तराखंड राज्य की कल्पना की गई थी. बेशक पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की तर्ज पर त्रिवेंद्र रावत सरकार भी हरिश रावत के ‘हिटो पहाड़’ जैसे जुमलों की तरह ‘सेल्फी ऐट दी विलेज’ जैसे नारे देकर पलायन पर अंकुश लगाने का दंभ भर रही है, लेकिन बावजूद इन असफल सरकारी प्रयासों के आज भी राज्य के करीब 3000 से अधिक गांव लगभग खाली हो चुके हैं.

यही नहीं ढाई से तीन हजार प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में ताले लग चुके हैं. एक मोटे अनुमान के मुताबिक पहाड़ों के करीब दो से तीन लाख घरों में ताले लटके पड़े हैं और ऐसा लगता है कि गावों की जिंदगी में एक अजीब सा शून्य पैदा हो गया है. पहाड़ों के अच्छी-खासी आबादी वाले गांव आज खाली होने के कगार पर पहुंच चुके हैं. दरअसल इस तथ्य के दो पहलू हैं. एक- क्या पलायन पहाड़वासियों को आर्थिक तौर पर समृद्ध बना रहा है. दूसरा- क्या उत्तराखंड से बढ़ते पलायन से आने वाले दिनों में पहाड़ों की संस्कृति, सभ्यता और विकेंद्रीयकृत विकास को नुकसान पहुंचेगा.

इन दोनों सवालों के जवाब में मेरा तो यही मानना है कि पलायन के बाद आने वाली आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और अन्य प्रकार की समृद्धि भले ही पहाड़वासियों को सुख का अनुभव कराती हो, लेकिन इस पलायन से पहाड़ों की संस्कृति, सभ्यता, आबो-हवा और कुछ हद तक विकास को पहुंच रहे बेतहाशा नुकसान को भी हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. सवाल है कि यदि ये सब होना ही था तो फिर हमें इतने संघर्षों और बेसकीमती जानों को गवां कर पृथक उत्तराखंड राज्य प्राप्त करने की जरूरत ही क्या थी.

उत्तराखंड से हो रहे बेतहाशा पलायन ने उत्तराखंड सहित देश के कोने-कोने में रह रहे उत्तराखंड मूल के आमजनों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, चिंतकों, पत्रकारों, छात्रों, युवाओं और महिलाओं को इस कदर झकझोर कर रख दिया है कि उत्तराखंड सहित पूरे देश में इस समस्या पर सही सोच वाले लोग लामबंध हो रहे हैं और अपने-अपने स्तर पर संगोष्ठियों और विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम से सरकार और आम जनता तक अपनी आवाज़ पहुंचा रहे हैं.

गढ़वाल मंडल के पौड़ी जिले में पलायन पर हाल ही में हुई एक तथ्यपरक बहस इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पहाड़ के बुद्धिजीवी और आमजन अब इस विषय पर न सिर्फ कुछ ठोस कर गुजरने की तम्मन्ना रखते हैं, बल्कि अपनी बुलंद आवाज़ से उत्तराखंड सरकार को भी ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि इसमें देर हो चुकी है और राज्य के मुख्यमंत्री, मंत्रियों, विधायकों, शासन-प्रशासन और आम जनता को इस दिशा में ठोस पहल करनी होगी, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए.

उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक राज्य में आठ बार सरकारें बदलीं और इस छोटे से दौर में 8 मुख्यमंत्री आए, लेकिन बड़े दुःख का विषय है कि पलायन के सिलसिले को रोकने में कोई सरकार कामयाब नहीं हो सकी. ये सही अर्थों में हमारे प्रदेश के राजनैतिक तंत्र और उसके मुखिया के नेतृत्व की कमजोरी को ही दर्शाती है. जाहिर बात है कि पलायन और वो भी इतनी तीव्र गति से, वही होगा, जहां जनता को रोज़गार, स्वास्थ्य, अच्छी शिक्षा, वीकेंद्रीयकृत विकास और आर्थिक स्वावलम्बन के मौके उपलब्ध नहीं होंगे. आज दुर्भाग्य से उत्तराखंड के पहाड़ों में वही हो रहा है. राज्य निर्माण के 17 वर्षों के लम्बे अंतराल के बाद भी आज उत्तराखंड में व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है. समय-समय पर यहां राज कर चुकी सरकारों और उसके मुखियाओं ने आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, औद्योगिक और सांस्कृतिक विकास के लम्बे चौड़े दावे तो किए, लेकिन सही मायनों में इन्हे वीकेंद्रीयकृत स्तर पर जिले, ब्लॉक और गावों के स्तर तक नहीं पहुचाया.

उत्तराखंड में आज स्वस्थ्य सेवाओं, अच्छी शिक्षा और क्षेत्रीय स्तर पर रोजगार व लोकल व काटेज इंडस्ट्रीज का इस कदर अभाव है कि जनता को मजबूरीवश उत्तराखंड के शहरों और दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता जैसे शहरों की तरफ वृहत्तर पैमाने पर पलायन करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है.

उधर उत्तराखंड के पर्यावरण का भी चीरहरण जारी है. सरकार बड़े-बड़े बांधों को सिरे चढ़ाने के उद्देश्य से न सिर्फ उत्तराखंड के पर्यावरण, यहां की नदियों, आबो हवा और जनता के साथ खिलवाड़ कर रही है बल्कि इन परियोजनाओं के जरिये देश के बड़े-बड़े पूंजीपतियों, ठेकेदारों और भ्रष्ट नेताओं की जेबों को भी गरम कर रही है. कहने वाले कहते हैं कि उत्तराखंड राज्य के निर्माण से अगर सही मायनों में किसी को फ़ायदा पंहुचा है तो वह लाटरीनुमा फ़ायदा पहाड़ों के नेताओं और भ्रष्ट अफसरशाही को मिला है. क्योंकि इन्ही के अनहोली नेक्सस के चलते आज पहाड़ खोकले हो रहे हैं. नदियों की अविरल धारा प्रभावित हो रही है, इनके किनारे अवैध तौर पर पर्यावरणीय सिद्धांतों को धता बताते हुए बड़े-बड़े होटलों, ऐशगाहों और बिल्डिंगों का निर्माण हो रहा है। जनता व उत्तराखंडी हिमालय अपनी हत्या से कराह रहे हैं.

साल 2013 की भयंकर आपदा जिसे देश के पर्यावरणविधों और भूगर्भीय वैज्ञानिकों ने मानवजनित आपदा की संज्ञा दी, इन्ही सरकारी कुप्रबंधनों का नतीजा है. आज आप उत्तराखंड के किसी भी जिले में चले जाइए, हज़ारों नहीं तो सैकड़ों की तादाद में कार्यरत गैरकानूनी स्टोन क्रशर्स न सिर्फ पहाड़ों की खेती को बर्बाद कर रहे हैं, नदियों को नालों में परिवर्तित कर रहे हैं, बल्कि उत्तराखंड में गैरकानूनी तरीके से करोड़ों कमा रहे सफेदपोशों की अपराधिक फ़ौज़ भी तैयार कर रहे हैं. अवैध खनन के खिलाफ अपनी लेखनी चलने वाले पत्रकारों और जन सरोकारों से जुड़े लोगों पर निरंतर हमले जारी हैं और सरकारें आंख मूंदे बैठी हैं.

कितनी शर्मनाक और निंदनीय बात है कि गंगा के किनारे अवैध खनन को रोकने और गंगा की सफाई के लिए संघर्षरत और 77 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे स्वामी निगमानंद को तो अपनी बेशकीमती जान तक से हाथ धोना पड़ा. लेकिन बड़े ही दुःख के साथ कहना पड़ता है कि सरकार और प्रसाशन तंत्र के कानों पर जूं नहीं रेंगी. नतीजतन, उत्तराखंड आज अबोड ऑफ गाड्स अर्थात देव भूमि की बजाय अबोड ऑफ क्रिमिनल्स बन चुका है. जहां शहरों और दूसरे राज्यों से अपराधी आकर इसे बेहद सेफ हेवन समझकर यहां से अपनी गैर कानूनी गतिविधियां जारी रखे हुए हैं. उत्तराखंड की बेशकीमती जमीनों को आज औने-पौने दामों पर बाहर के पूंजीपतियों को बड़े-बड़े होटल निर्माण, मॉल्स और निजी स्कूलों के लिए सरकारी सहयोग और संरक्षण से बेचा जा रहा है. जबकि क्षेत्रीय ग्रामीण बुद्धू बनकर सबकुछ देखने को मजबूर है. जाहिर है एक करोड़ दस लाख की आबादी वाला उत्तराखंड आज अपने ही जयचंदों का शिकार बन चुका है और बाहरी लोग इस देवभूमि को अपनी ऐशगाह बनाने पर तुले हुए हैं.

उत्तराखंड के सही सोच वाले लोगों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं, बड़े बुजुर्गों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, चिंतकों और जनसरोकारों से जुड़े साथियों को एकजुट होकर इन ईविल डीसाईंस का पूरी शक्ति, ताकत और मजबूती से मुकाबला करना होगा और उत्तराखंड की चौमुखी बेहतरी, आर्थिक, समाजिक, सांस्कृतिक, औद्योगिक, स्वस्थ्य संबंधी, बेहतरी, विकास और आत्मनिर्भरता के लिए धरा 371 लागू कराने की दिशा में एक बेहद मजबूत और सशक्त आंदोलन को सिरे चढ़ाना होगा. यही वक्त की नजाकत और पुकार है.

मौजदा भाजपा सरकार को सत्ता में आए अभी लगभग सात महीने बीत चुके हैं, लेकिन विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी योजनाओं को लेकर जुमलेबाजी के अल्लावा कुछ हासिल नहीं हुआ. अलबत्ता देश के प्रधानमंत्री ने केदारनाथ के कायाकल्प, 12000 करोड़ रुपये के ऑल वेदर रोड्स, रुद्रप्रयाग तक रेल और भारी-भरकम केंद्रीय सहयोग की घोषणाएं अवश्य की हैं, जो अब भी किसी दिवास्वप्न से कम नहीं हैं. क्योंकि इन सभी योजनाओं का औपचारिक कम्पलीशन पीरियड अब भी भविष्य के गर्भ में छिपा है. सवाल है तब तक क्या इस सरकार का शासन बरकरार रहेगा. बहरहाल आज उत्तराखण्ड 47 हजार करोड के घाटे के दौर से गुजर रहा है.

लेखक उत्तराखंड पत्रकार फोरम के अध्यक्ष हैं