नन्हे-मुन्नों की सांसों में जहर घोल रहे पटाखें

दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर बैन है, लेकिन पटाखा जलाने के शौकीन लोगों पर कोई रोक नहीं है. लिहाजा दिवाली की रात दिल्ली की आबोहवा में जहर घुलना तय है. अब जरा सोचिए कि क्या आप हर सांस में जहर लेना चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं कि आपके पटाखों के धुएं का शिकार होकर नन्हें-मुन्ने बच्चे बीमार पड़ जाए? जाहिर है कि आपका जबाव ना होगा, लेकिन इसके बावजूद आपके पटाखे जलाने का शौक या यूं कहें कि जरा सी लापरवाही आपके और आपके बच्चों को बीमार कर सकती है. पटाखों का धुआं दिल्ली की आबोहवा में केमिकल और पार्टिकुलेट मैटर का स्तर बढ़ा देता है. दिवाली से पहले ही दिल्ली में वायु की गुणवत्ता काफी खराब हो चुकी है. सर गंगाराम हॉस्पिटल के चेस्ट सर्जन डॉ अरविंद कुमार के मुताबिक दिल्ली वाले हर सांस में जहर ले रहे हैं.

औसतन एक व्यक्ति 24 घंटे में 25 हजार बार सांस लेता है और अपनी हर सांस में 350 से 450 मिलीलीटर हवा अपने फेफड़ों तक पहुंचाता है यानी हर एक सांस के साथ आप लगभग एक गिलास जहर पी रहे हैं. अगर ऐसे में दिल्ली की हवाओं में पटाखों से निकलने वाले खतरनाक केमिकल भी मिल जाएंगे, तो सोचिए ये जहर आपको कितना बीमार कर देगा. विशेषज्ञों के मुताबिक दिल्ली की आबोहवा पहले से ही काफी खराब है. जिस हवा में इस वक्त हम सांस ले रहे हैं, वो लगभग 20 से 25 सिगरेट पीने के बराबर जहरीली है. इस तरह जाने-अनजाने हम रोजाना अपने फेफड़ों तक प्रदूषित हवा पहुंचा रहे हैं. ऐसे में दिवाली की रात जब हजारों लोग पटाखा जलाते हैं, तो हवा में प्रदूषित कणों की मात्रा में जबरदस्त इजाफा हो जाता है. पटाखों में पाए जाने वाले केमिकल बेहद खतरनाक है, जो सांस के जरिए हमारे फेफड़ों में जमा हो जाते हैं और धीरे-धीरे हमें बीमारियों की चपेट में ले लेते हैं.

बच्चों को न थमाएं फुलझड़ी, सांप गोलियां
पटाखा जलाने के शौकीन लोगों को अक्सर ये तर्क देते देखा जाता है कि कम आवाज वाले पटाखे और कम प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों से कुछ नहीं होता है. बच्चों के मनोरंजन के लिए भी माता-पिता फुलझड़ी, सांप गोलियां, चकरी और अनार जलाने की इजाजत दे देते हैं, जबकि डॉक्टरों की माने तो ऐसा कोई पटाखा नहीं है, जो प्रदूषण ना फैलाए. जिन सांप की गोलियों को बच्चे बड़े आराम से जलाते हैं, उसकी एक गोली से 64,500 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर पीएम 2.5 प्रदूषण फैलता है, जो डब्ल्यूएचओ के मुताबिक सामान्य स्तर 25 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर से 2,560 गुना ज्यादा है. इसी तरह छोटे-छोटे बच्चों को दिवाली पर रंग-बिरंगी फुलझड़ियां सबसे ज्यादा लुभाती हैं, लेकिन एक फुलझड़ी के जलाने से 10,390 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर च्ड 2.5 प्रदूषण निकलता है, जो सामान्य स्तर 25 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर से 415 गुना ज्यादा प्रदूषण पैदा करती है. इसी तरह एक अनार जलाने पर 4,860 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर पीएम 2.5 वायु प्रदूषण होता है, जो कि डब्ल्यूएचओ के मुताबिक सामान्य स्तर से 194.4 गुना ज्यादा वायु प्रदूषण फैलाता है.

यह किसी भी स्वस्थ्य व्यक्ति को बीमार करने के लिए काफी है. सर गंगाराम हॉस्पिटल के चेस्ट सर्जन डॉ अरविंद कुमार के मुताबिक पटाखों को रंगीन और आकर्षित बनाने के लिए उसमें मरकरी और सल्फर जैसे कई तरह के केमिकल इस्तेमाल किए जाते हैं. इतना ही नहीं, आजकल पटाखों में सीजियम नाम के रेडियोएक्टिव पदार्थ का भी इस्तेमाल होता है, जो सांस के साथ फेफड़ों में जमा हो जाते हैं और लोगों को अस्थमा, ब्रोनकाइटिस जैसी बीमारियों का शिकार बना देते हैं.