आदि शंकराचार्य की समाधि की पुनरुद्धार परियोजना से पूर्व CM हरीश रावत को है यह आपत्ति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा केदारनाथ में आदि शंकराचार्य की समाधि की पुनरुद्वार परियोजना का शिलान्यास करने पर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आपत्ति व्यक्त की. उन्होंने सोमवार को कहा कि आठवीं सदी के ऋषि द्वारा स्थापित चारों पीठों के शंकराचार्यों द्वारा यह कार्य किया जाना चाहिए था.

केदारनाथ में आदि शंकराचार्य की समाधि वर्ष 2013 में आयी प्रलयंकारी आपदा के दौरान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी.

हरीश रावत ने अस्थायी राजधानी देहरादून में संवाददाताओं से कहा, ‘यह पूर्ववर्ती सरकार की परियोजना (समाधि) थी. हम चाहते थे कि चारों पीठों के शंकराचार्य इसकी आधारशिला रखें और उसका उद्घाटन करें. हालांकि, बीजेपी ने संतों और ऋ​षियों द्वारा किये जाने वाले कार्य को प्रधानमंत्री से कराए जाने का निर्णय लिया है.’

पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि उन्होंने (बीजेपी ने) ऋषि-मुनियों के कार्य को प्रधानमंत्री के सुपुर्द कर उनका कद धर्मपुरुषों के बराबर करने का प्रयास किया है. इस बीच, द्वारिका शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति को एक पत्र लिखकर कहा है कि प्रधानमंत्री द्वारा परियोजना का शिलान्यास स्वागतयोग्य है लेकिन पुनरुद्धार का कार्य किसी और संस्था को नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि इस पर आदि गुरू द्वारा स्थापित की गयी चारों पीठों के शंकराचार्यों का पहला अधिकार है.

समिति को लिखे पत्र में शंकराचार्य स्वरूपानंद ने कहा, ‘परियोजना की आधारशिला प्रधानमंत्री द्वारा रखे जाने में कुछ भी गलत नहीं है बल्कि यह स्वागतयोग्य है लेकिन पुनरुद्वार कार्य करना हमारा (शंकराचार्यों का) पहला अधिकार है.’

पत्र में उन्होंने लिखा है, ‘मंदिर समिति ने इस साल मई में बद्रीनाथ भ्रमण के दौरान मुझसे आदि शंकराचार्य की समाधि का पुनरुद्वार करने का आग्रह किया था. मैंने जयपुर में आदिगुरू की प्रतिमा बनवाकर उसे केदारनाथ भेजा था. यह विनोद कुमार शुक्ला के आंगन में रखी हुई है.’