उत्तराखंड में आबाद होंगे ‘घोस्ट विलेज’, रोजगार भी खूब मिलेंगे

पलायन के चलते उत्तराखंड के सैकड़ों गांव पूरी तरह वीरान हो चुके हैं।

भुतहा हो चुके हैं सैकड़ों गांव

पलायन का दंश उत्तराखण्ड बुरी तरह झेल रहा है। पढ़ाई-लिखाई के लिए बाहर जाना तो समझ आता है लेकिन इन गांवों का तो यह हाल है कि एक बार यहां से जाने वाला दोबारा पलटकर आया ही नहीं। कभी इन गांवों में खूब चहल-पहल रहा करती थी लेकिन अब घर, गौशलाएं सब का सब खण्डर में तब्दील हो गया है। यही वजह है कि इन्हें घोस्ट विलेज कहा जाने लगा है। इतना ही नहीं करीब दो हजार गांव ऐसे भी हैं जो पूरी तरह खाली तो हो चुके हैं लेकिन गर्मियों में या फिर ग्राम देवता की पूजा आदि के अवसरों पर कुछ लोग अपने घर लौट आते हैं।

आयोग भी इन हालात से वाकिफ है और यही उसके लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है। आयोग का कहना है कि घोस्ट विलेज उन गांवों को कहा जाता है जहां अब कोई नहीं रहता। ऐसा भी कह सकते हैं कि इन गांवों में हालात ऐसा नहीं हैं कि वहां कोई रह सके। ऐसे गांवों को फिर से आबाद करना एक बड़ी चुनौती है। आयोग सभी आयामों की अच्छी तरह जांच करने के बाद इसके लिए एक ठोस कार्ययोजना तैयार कर सरकार को सौंपेगा।

समस्या की जड़ तक जाना है
आयोग की कोशिश समस्या के मूल तक जाकर हल निकालने की है। उत्तराखंड में पलायन की मुख्य वजह क्या है। क्या सरकार की ओर से गांवों की अनदेखी हुई। सरकारी योजनाओं में स्थानीय हालात को नजरअंदाज किया गया या फिर कोई अन्य कारण हैं। आयोग ग्रामीणों से संवाद कर भी समस्या का हल निकालने का प्रयास करेगा। आयोग का कहना है कि इसकी रणनीति तैयार कर ली गई है।