पीएम मोदी ने बांधे नीतीश की तारीफों के पुल, लेकिन मांगें कर दीं खारिज

NDA में शामिल हो गया जद (यू)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा कोई राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं और उनके जैसा कोई सहयोगी भी नहीं है. ये सच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बेहतर शायद ही कोई जानता हो. एक ज़माने में नीतीश कुमार का डीएनए ख़राब है जैसे भाषण देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को उनकी तारीफ के पुल बांधने में भी कोई कसर नहीं रखी.

हालांकि नीतीश और उनके समर्थक इस बात से जरूर मायूस होंगे कि एक मंच से एक नहीं कई बार पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने की मांग करने के बावजूद नरेंद्र मोदी ने उनकी मांग को अनसुना कर एक ऐसा रास्ता दिखाया, जिसमें बिहार का कोई जर्जर विश्वविद्यालय अगले कुछ दशक तक शयद ही चुना जाए.

प्रधानमंत्री ने भले ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मुख्य मांग ख़ारिज कर दी हो, लेकिन अपने नए सहयोगी नीतीश कुमार की तारीफों के पुल बांधने से वे नहीं चूके. उसी समारोह में पटना में मोदी ने कहा, ‘नीतीश जी की बिहार के विकास के लिए जो प्रतिबद्धता है और भारत सरकार भी पूर्वी भारत के विकास के लिए कृतसंकल्प है और अगले पांच वर्षों में दोनों मिलकर बिहार को समृद्ध बनाने में कामयाब होंगे.’

वहीं मोकामा में प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मैं नीतीश जी का आभारी हूं कि भारत सरकार की सभी योजनाओं को शुरू कर सुचारू रूप से चला रहे हैं. बिहार और केंद्र कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है, जिसका परिणाम अच्‍छा आने वाला है. नीतीश जी का इस क्षेत्र से भावनात्मक लगाव रहा है. आपसे कंधे से कंधा मिलाकर चलेगी भारत सरकार.’

हालांकि मोकामा की सभा में नीतीश की गंगा की निर्मलता और अविरलता के संबंध में की गई मांगों पर मोदी का रुख सकारात्मक था. मोदी ने कहा कि गंगा को बचाने का प्रयास पहले की सरकारों ने नहीं किया, लेकिन अब केंद्र सरकार इस पर अरबों खर्च कर रही है. उन्होंने वादा किया कि रसायन युक्त पानी गंगा नदी में न जाए इसलिए प्रयास किए जा रहे हैं.

जहां पर सभा का आयोजन किया गया था उस क्षेत्र की समस्या के बारे में नीतीश कुमार ने विस्तार से चर्चा की थी और उस पर भी प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस इलाके को मिनी कोलकाता कहा जाता था और मैं वो शोहरत वापस लाऊंगा.

कई वर्षों के राजीनतिक तनाव के बाद नीतीश कुमार जब से मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय लोकत्रांतिक गठबंधन के सहयोगी बने हैं, उसके बाद मोकामा की सभा पहला मौका थी जब दोनों दलों के लोग सहयोगी के तौर पर एक साथ थे. निश्चित रूप से पटना हो या मोकामा, बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का वर्चस्व दिखा।