उत्तराखंड में महात्मा गांधी की विरासत खत्म होने के कगार पर, जाग जाओ ‘सरकार’

कभी महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक रहा खादी उद्योग बढ़ती मांग के बावजूद सरकारी उपेक्षा के कारण उत्तराखंड में धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है.

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में स्थित खादी प्रतिष्ठानों का कहना है कि राज्य में अब तक रहीं सरकारों का रुख खादी उद्योग और उससे जुड़े कलाकारों की जरूरतों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण नहीं रहा है, जिसके परिणामस्वरूप कच्चा माल खरीदने में धन की कमी और राज्य में खादी निर्माण में लगी इकाइयों के लिए कारीगरों की कमी हो गई है.

महात्मा गांधी के शिष्य रहे शांति लाल त्रिवेदी द्वारा अल्मोडा में स्थापित खादी आश्रम चानौदा जिले की एकमात्र खादी निर्माण इकाई है और वह भी कच्चा माल खरीदने में धन की कमी के कारण खादी तैयार करने की स्थिति में नहीं रह गई है.

खादी आश्रम चानौदा के प्रबंधक हेमचंद्र पंत ने कहा, ‘हम प्रति वर्ष दस करोड रुपये खादी सामान की मांग के विपरीत हर साल पांच करोड़ रु का सामान बेच रहे हैं. कच्ची ऊन खरीदने में संगठन की कमी के कारण हम इस मांग को पूरा करने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं.’

बाजार की मांग के हिसाब से कच्चा माल खरीदने के लिए धन का प्रबंध न होने के कारण कभी कुमाऊं में 4000 लोगों को रोजगार देने वाले इस खादी संगठन में काम करने वालों की संख्या कम होती जा रही है.

पंत ने कहा, ‘अगर राज्य सरकार का संरक्षण मिले तो खादी 10 हजार से ज्यादा किसानों, भेड़ पालकों और घर से कुटीर उद्योग चलाने वाले लोगों को रोजगार देने में सक्षम है.’ चानौदा के अलावा, उत्तराखंड के नैनीताल जिले में हल्द्वानी क्षेत्र में स्थित गांधी आश्रम, सरकार द्वारा संचालित खादी ग्रामोद्योग बोर्ड की अल्मोडा, नैनीताल और उधमसिंह नगर जिले में चल रही खादी इकाइयां और कुछ अपने स्तर पर खादी बुनने वाले लोग भी खादी उद्योग में लगे हुए हैं.

पंत के मुताबिक, हर साल दो अक्टूबर से खादी के सामान पर सरकार द्वारा दी जाने वाली रियायत के एवज में मिलने वाला धन भी पिछले 20 साल से संगठन को नहीं मिला है. यह रियायत राशि अब तक 65 लाख रुपये हो चुकी है.