ट्रिपल तलाक की जंग जीतने वाली इशरत कर रही सामाजिक बहिष्कार का सामना

तीन तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया है, जिसका समाज के तकरीबन हर वर्ग ने स्वागत किया है, लेकिन तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने वाली इशरत जहां की लड़ाई अभी यहीं नहीं खत्म हुई है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब इशरत जहां को समाज के बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है. कोर्ट के बाहर इशरत की यह लड़ाई कानूनी लड़ाई से कहीं ज्यादा मुश्किल साबित होने वाली है. कोर्ट के बाद समाज से लड़ाई इशरत जहां ने देश की सबसे बड़ी अदालत में तीन तलाक की लड़ाई के साथ-साथ अपने व्यक्तिगत जीवन में गरीबी के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी है. तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचने की वजह से इशरत को अपने ससुराल वालों और पड़ोसियों की भी आलोचना का सामना करना पड़ा. लेकिन इन तमाम लड़ाइयों को इशरत ने अकेले बेहद मजबूती से लड़ा और कभी भी उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं हारी, उनकी इस लड़ाई का लाभ अब देशभर की मुस्लिम महिलाओं को मिलेगा. लेकिन एक तरफ जहां इशरत जहां की देशभर में सम्मान मिल रहा है तो दूसरी तरफ उन्हें बदनाम किए जाने का अभियान शुरू कर दिया गया है.

तलाक सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इशरत जहां को कई आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है, उनके खिलाफ अभियान शुरू कर दिया गया है, यहां तक कि मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उनके पड़ोसियों ने ही उनके चरित्र तक पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. इशरत जहां के पति ने उन्हें दुबई से 2014 में फोन पर तलाक दे दिया था, जिसके बाद इशरत जहां ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इशरत जहां के अलावा चार अन्य मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, इन तमाम याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक और गैरकानूनी करार दिया है. इशरत जहां बताती हैं कि जबसे सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दिया है तबसे मेरे ससुराल वाले, पड़ोसी मुझे अपशब्द कह रहे हैं, मेरे चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं और मेरे बारे में भद्दी-भद्दी बातें कर रहे हैं. मुझे गंदी औरत जैसे शब्द सुनने पड़ रहे हैं, आदमी की दुश्मन, इस्लाम की दुश्मन जैसे शब्दों का मुझे सामना करना पड़ रहा है. यहां तक कि कई पड़ोसियों ने तो मुझसे बात तक करना बंद कर दिया है. इशरत जहां कोलकाता के हावड़ स्थित डोबसन रोड पिलखाना में रहती हैं. वह यहां 2004 से रह रही हैं. यह घर उनके पति ने दहेज में मिले पैसों से खरीदा था. इस घर में उनके पति का बड़ा भाई, उनकी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य भी रहते हैं.

इशरत बताती हैं कि मैं इस घर में अब असुरक्षित और डरी हुई महसूस करती हूं, इतनी बड़ी लड़ाई लड़ने के बाद अब मुझमें लोगों से और लड़ने की हिम्मत नहीं बची है. मैं अपने चार बच्चों पर ध्यान देना चाहती हूं. इशरत जहां में अब काफी बदलाव भी आ गया है, वह अब दुनिया का सामना नकाब उतारकर करती हैं, वह दुनिया के सामने अपना चेहरा दिखाकर बात करती हैं. नकाब नहीं पहनने के बारे में इशरत कहती हैं कि अब मैं पीड़िता नहीं हूं, मैं चाहती हूं कि और औरते मुझे देखें और इस बात को समझें कि अगर मेरे जैसी एक साधारत महिला अपने अधिकारों के लिए लड़ सकती है तो आप क्यों नहीं.समाज को बदलना होगा, मैं अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए लड़ुंगी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ना सिर्फ इशरत जहां बल्कि उनकी वकील नाजिया इलाही खान को भी सोशल मीडिया पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है. इशरत कहती हैं कि सिर्फ कोर्ट के एक फैसले से समाज नहीं बदलेगा, बल्कि यह लोगों के नजरिए को बदलेगा, मेरे मामले में वे लोग मेरे दुश्मन बन गए हैं, मेरा मजाक उड़ाते हैं, मुझपर हंसते हैं, समुदाय में अंदर से बदलाव आना चाहिए.

जब लोग इस बात का फैसला कर लें कि वह चरित्र के हनन की बजाए असहाय और असुरक्षित महिला की मदद के लिए आगेआएंगे तो जिन मुश्किलों का सामना मैंने अपने जीवन में किया है वह कोई और महिला नहीं करेगी. इशरत बताती हैं कि मेरे बच्चे चार साल से स्कूल नहीं गए हैं क्योंकि मेरे पास उनकी पढ़ाई के लिए पैसा नहीं है. मैं अब एक केस करने जा रही हूं जिसमें मैं अपने बच्चों की शिक्षा के लिए वहन की मांग करुंगी, यह मेरे बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है.