ग्रामीणों के पुनर्वास को लेकर एनजीटी ने त्रिवेंद्र रावत सरकार से मांगा जवाब

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने उत्तराखंड के पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में रह रहे ग्रामीणों के पुनर्वास के संबंध में शुक्रवार को राज्य सरकार को एक शपथपत्र दायर करने को कहा.

याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वकील ने कहा कि राज्य सरकार लोगों को बुनियादी जरूरतें मुहैया कराने में नाकाम रही है, जिसके बाद न्यायमूर्ति जवाद रहीम के नेतृत्व वाली पीठ ने त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार से उद्यान के अंदर रह रहे लोगों की स्थिति का ब्यौरा देने को कहा.

हरित अधिकरण उत्तराखंड के निवासी मदन सिंह बिष्ट द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें उद्यान की सीमाओं में आने वाले राजस्व गांव ‘चाक’ (संपदा) के पुनर्वास के मुद्दे पर ध्यान देने के लिए एक निगरानी समिति गठित करने की मांग की गई है.

बिष्ट के वकील गौरव बंसल ने अधिकरण से कहा कि उत्तराखंड सरकार पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाके में रहने वाले बच्चों तथा परिवारों को बिजली, पेयजल, चिकित्सा सुविधा जैसी सुविधाएं मुहैया कराने में नाकाम रही है. मामले में अब 31 अगस्त को अगली सुनवाई तय की गयी है.

याचिका में कहा गया कि 1983 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अधिसूचना जारी की थी तथा राजाजी राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की थी. हालांकि इसके दायरे में आने वाले राजस्व संपदाओं का कोई उल्लेख नहीं था.

तब ग्रामीणों ने इस पर आपत्ति की, जिसके बाद कुछ समितियों का गठन किया गया और कुछ बैठकों के बाद राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र से राजस्व चाक को अलग करने के लिए जरूरी उपाय करने की खातिर प्रस्तावों को मंजूरी दे दी गई.

याचिका के अनुसार हालांकि अब तक अधिकारियों ने उद्यान से राजस्व चाक अलग करने को लेकर कोई फैसला नहीं लिया है. बिष्ट ने दावा किया कि उद्यान में आने वाले क्षेत्र का विकास न होने के अलावा ग्रामीण कई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें जंगली जानवरों से जीवन के खतरे का हमेशा सामना करना पड़ता है.